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सुस्त सिस्टम को झुठलाया, 13 दिन के मासूम की जिंदगी बचाने छुट्टी में भी खुला दफ्तर

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बैतूल। सरकारी व्यवस्था को अक्सर सुस्त कहा जाता है, लेकिन बैतूल स्वास्थ्य विभाग ने संवेदनशीलता और त्वरित निर्णय का उदाहरण पेश करते हुए यह धारणा तोड़ दी। अवकाश के दिन भी कार्यालय खोलकर एक नवजात की जिंदगी बचाने की पहल की गई। आर.बी.एस.के. (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) के जिला प्रबंधक योगेन्द्र कुमार और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज हुरमाड़े की तत्परता से 1 माह 13 दिन के नवजात आद्विक इवने के हृदय ऑपरेशन के लिए 2 लाख 75 हजार रुपये की राशि तत्काल स्वीकृत की गई।

 

शाहपुर वार्ड क्रमांक 1 निवासी संजय कुमार इवने के पुत्र आद्विक को जन्म के कुछ दिनों बाद ही सांस लेने में दिक्कत और तेज धड़कन की समस्या होने लगी। नागपुर में कराई गई ईको जांच में बच्चे को गंभीर हृदय रोग से पीड़ित पाया गया। परिवार ने रायपुर के सत्य सांई अस्पताल में निशुल्क इलाज की कोशिश की, लेकिन बच्चे को सर्दी-खांसी होने से जांच नहीं हो सकी।

 

निराश पिता ने जब आर.बी.एस.के. जिला प्रबंधक योगेन्द्र कुमार से संपर्क किया, तो उन्होंने मामले को गंभीरता से लेते हुए तुरंत इंदौर के राजश्री अपोलो अस्पताल से चर्चा की। डॉक्टरों ने बताया कि बच्चे के फेफड़ों से हृदय तक जाने वाली नली का गलत जुड़ाव है और तत्काल ऑपरेशन जरूरी है, क्योंकि ऑक्सीजन स्तर तेजी से गिर रहा था।

 

बच्चे की रिपोर्ट और अनुमानित खर्च प्राप्त होने पर योगेन्द्र कुमार ने सीएमएचओ डॉ. मनोज हुरमाड़े से बात की। डॉ. हुरमाड़े ने अवकाश के बावजूद कार्यालय खोलकर शासन की आर.बी.एस.के. योजना के तहत 2 लाख 75 हजार रुपये की राशि स्वीकृत कर आदेश जारी किया।

 

अगर यह योजना न होती तो ऑपरेशन पर करीब 10 से 12 लाख रुपये का खर्च आता, जो परिवार के लिए असंभव था। इस मानवीय कार्य में कंप्यूटर ऑपरेटर प्रवीण मेहुणकर का भी विशेष योगदान रहा।

 

यह पहल न केवल एक बच्चे की जिंदगी बचाने का उदाहरण बनी, बल्कि यह भी साबित किया कि संवेदनशील अधिकारी चाहें तो सरकारी व्यवस्था भी जीवनदायी बन सकती है।

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