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Freedom fighter:आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाही राधाकृष्ण सिंह नहीं रहे,105 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस, नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ लड़े थे आज़ादी की लड़ाई

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Freedom fighter: Azad Hind Fauj soldier Radhakrishna Singh is no more, took his last breath at the age of 105, he fought the freedom struggle with Netaji Subhash Chandra Bose

बैतूल। देश की आज़ादी की लड़ाई में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेने वाले आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाही राधाकृष्ण (राधा किशन) सिंह शास्त्री का निधन हो गया।
वे 105 वर्ष के थे और उन्होंने आज सुबह 10:30 बजे अंतिम सांस ली।


🕊️ जन्म और प्रारंभिक जीवन

राधाकृष्ण सिंह का जन्म 1 जनवरी 1920 को बर्मा (म्यांमार) के पेंगु जिले के चौदगा गांव में हुआ था।
उनके माता-पिता बिहारी मूल के थे, जो वर्ष में छह माह भारत और छह माह बर्मा में रहते थे।
बचपन से ही वे स्वतंत्रता सेनानियों के संपर्क में रहे और देशभक्ति की भावना उनमें प्रारंभ से ही प्रबल थी।


⚔️ नेताजी के आह्वान पर फ़ौज में भर्ती

1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आह्वान पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज में भर्ती होकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया।
रासबिहारी बोस की प्रेरणा से उन्होंने सिंगापुर में “चनमारी” नामक सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया।
उन्होंने इम्फाल और कोहिमा के मोर्चों पर अंग्रेज़ी सेना के खिलाफ मोर्चा संभाला।

लड़ाई के दौरान उन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने गिरफ्तार कर तीन माह जेल में रखा।
क्रांतिकारी भोला भाई देसाई के प्रयासों से उन्हें रिहाई मिली।


🌏 द्वितीय विश्वयुद्ध और फ़ौज की वापसी

द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी और इटली की हार, तथा हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु हमलों के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया, जिससे आज़ाद हिंद फ़ौज को पीछे हटना पड़ा।
बर्मा छोड़ने से पूर्व नेताजी ने अपने सैनिकों से अंतिम भेंट की थी — राधाकृष्ण सिंह उस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी रहे।


🇮🇳 आज़ादी के बाद का संघर्षपूर्ण जीवन

देश की आज़ादी के बाद राधाकृष्ण सिंह ने बर्मा में करीब दो दशक कठिन जीवन बिताया।
बाद में पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की प्रेरणा से वे भारत लौटे।
भारत आगमन पर उन्हें बैतूल जिले के पहाड़पुर गांव में 5 एकड़ भूमि प्रदान की गई।
जीविका के लिए उन्होंने पाथाखेड़ा की कोयला खदानों में मजदूर के रूप में कार्य किया और वहीं से सेवा निवृत्त हुए।


🏅 सम्मान और गौरव

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज़ाद हिंद फ़ौज की 75वीं वर्षगांठ पर दिल्ली में उन्हें सम्मानित किया था।
उन्हें केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से ताम्रपत्र और सम्मान निधि भी प्राप्त हुई।
वे जीवन के अंतिम समय तक लोगों का अभिवादन “जय हिंद” के उद्घोष से करते थे।
आज़ाद हिंद फ़ौज की वर्दी जैसा सफेद पैंट-शर्ट पहनना उनका प्रिय वस्त्र रहा।


👨‍👩‍👧 परिवार और विरासत

परिवार में उनके दो बेटे और एक बेटी हैं।
परिजनों ने बताया कि वे प्रतिदिन नेताजी के आदर्शों और देश की सेवा की बातें किया करते थे।


अंत्येष्टि कल

उनकी अंत्येष्टि कल (मंगलवार) को की जाएगी।
स्थानीय नागरिकों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवारों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।


 

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