Logo
ब्रेकिंग
BSF Attari Border News: अटारी सीमा पर रिट्रीट सेरेमनी का नया शेड्यूल जारी; शाम 5:30 बजे शुरू होगी पर... Batala Viral Video: गुरु नानक देव जी के विवाह पर्व में ट्रैक्टर स्टंट पड़ा भारी; तेज रफ्तार में पलटा... Dubai Visa Fraud: 90 हजार में दुबई भेजा, छीना पासपोर्ट और मुर्गीखाने में रखा! जालंधर के पीड़ित ने सु... Amritsar Flooding Alert: तरनतारन रोड के पास नहर टूटने से मचा हड़कंप; मिट्टी की बोरियों से दरार भरने ... Punjab Gold Silver Price Today: पंजाब में उछले सोना-चांदी के दाम; जालंधर में 24 कैरेट सोना ₹1.58 लाख... Ferozepur Central Jail: केंद्रीय जेल फिरोजपुर में फिर चला तलाशी अभियान; 10 और मोबाइल फोन बरामद, कैदि... Etah Fake University Scam: एटा में चायवाले के नाम पर चल रही थी फर्जी यूनिवर्सिटी; भेद खुला तो प्रिंस... Bihar Flood Relief: सीएम सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री राहत कोष में दान दी एक महीने की सैलरी; नितिन नब... Durg News Today: फेसबुक पोस्ट पर बवाल; भिलाई-3 थाने पहुंचे कांग्रेसी, भाजयुमो नेता पर FIR और गिरफ्ता... Agra Mahakumbh Ambikapur: सीएम विष्णु देव साय ने किया 'अग्र महाकुंभ 2026' का शुभारंभ; अग्रवाल समाज क...
Header Ad

दतिया उपचुनाव ” भाजपा: गलत निर्णयों की भरमार का दुष्परिणाम

0

राजीव खंडेलवाल
(लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास)

बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में उम्मीदवार चयन को लेकर हुई रणनीतिक भूल की तरह दतिया में भी भाजपा ने पिछले चुनाव के स्थापित, चिर-परिचित उम्मीदवार को बदलकर मानो “अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।” इसी एक निर्णय ने “हार की नींव” उसी दिन रख दी थी।
मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में शामिल रहे भाजपा के वरिष्ठ कद्दावर नेता एवं पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, जो पिछले चुनाव में मात्र लगभग 7 हजार मतों से पराजित हुए थे, का टिकट काटने का तो कोई ठोस, उचित और विश्वसनीय कारण कार्यकर्ताओं न तो बताया गया, और न ही उन्हें “मनाने” का गंभीर प्रयास हुआ। उनका दिल्ली दौरे में राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा और गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात न हो पाना भी दुर्भाग्यपूर्ण रहा।
स्थिति तब और बिगड़ गई, जब टिकट कटने के विरोध में जिला संगठन के अधिकांश पदाधिकारियों ने “सामूहिक इस्तीफे” दे दिए। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने ‘असंतुष्ट’ नरोत्तम मिश्रा को संगठन अथवा सरकार में कोई सम्मानजनक जिम्मेदारी देकर “संतुष्ट” कर नाराजगी दूर करने की कोशिश नहीं की। परिणामतः “बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय।”
*नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटना: हार का सबसे बड़ा कारण?*
मीडिया में सूत्रों के हवाले से यही कारण आया कि पार्टी के आंतरिक सर्वे में नरोत्तम मिश्रा चुनाव हार रहे थे। लेकिन सवाल ये है कि जिन आशुतोष तिवारी को उनका स्थान दिया गया, क्या उनका भी उतना ही व्यापक सर्वे कराया गया था?
राजनीति में जब किसी स्थापित नेता का टिकट काटना होता है, तो सबसे आसान तर्क “तथाकथित सर्वे” ही बन जाता है। पर यदि सर्वे ही “ब्रह्मवाक्य” होता अंतिम सत्य हो तो अनेक चुनावी परिणाम उसके विपरीत क्यों आते?
वस्तुत: नरोत्तम मिश्रा के लिए “कुआं-खाई” जैसी स्थिति थी, तो भाजपा नेतृत्व “ऊहापोह” में फंसा था। शायद इसीलिए नामांकन के अंतिम दिन भाजपा उम्मीदवार की घोषणा हुई। “आखिरी समय में आनन-फानन” का फैसला अक्सर “गले की हड्डी” बन जाता है।
*कांग्रेस की अधिकांश मोर्चों पर भाजपा पर बढ़त*
अपेक्षाकृत ज्यादा गुटबाजी से ग्रस्त कांग्रेस ने यहां 2 दिन पहले ही उम्मीदवार घोषित कर भाजपा से “बाजी मार ली”। लंबे समय बाद ऐसा चुनाव देखने को मिला, जिसमें कांग्रेस अपेक्षाकृत “व्यवस्थित” दिखी और भाजपा “अव्यवस्थित” हो गई।
यद्यपि संसाधनों और बूथ प्रबंधन में भाजपा की दक्षता निर्विवाद है, लेकिन इस चुनाव में “जन ने “तंत्र” पर भारी पड़ने” का संदेश दे दिया।
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटते ही भाजपा में भीतरघात की चर्चा “आम” हो गई थी। इससे निपटने की जिम्मेदारी प्रदेश नेतृत्व की थी, जिस पहली परीक्षा में ही वे असफल (फेल) हो गये। परिणाम आने के बाद प्रदेश अध्यक्ष का कथन कि “यदि कोई दोषी पाया जाएगा तो निश्चित रूप से कार्रवाई होगी” – इसका सीधा मतलब पार्टी अभी तक दोषी ही तय नहीं कर पाई।
4 अगस्त को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने जांच के लिए दो सदस्यीय समिति बनाई। आश्चर्यजनक रूप से समिति ने मात्र 6-7 घंटों में, दतिया विधानसभा क्षेत्र का दौरा किए बिना ही पूरे जिला संगठन को भंग करने की अनुशंसा कर दी। प्रदेश अध्यक्ष ने तुरंत आदेश जारी कर दिया। सवाल उठता स्वभाविक है कि क्या यह समस्या के समाधान का प्रयास था या सिर्फ “बलि का बकरा” खोजने की कवायद?
यदि चुनावी प्रबंधन में भी ऐसी ही “बुलेट ट्रेन जैसी त्वरित गति की “फुर्ती” दिखाई जाती, तो शायद परिणाम कुछ और होते।
दूसरी ओर कांग्रेस ने मतदान समाप्त होते ही, परिणाम आने से पहले ही पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। स्पष्ट है कि कांग्रेस नेतृत्व पूरे घटनाक्रम पर “बाज की नजर” रखे हुए था। विजयी प्रत्याशी ने भी “भीतरघात” की शिकायत पार्टी नेतृत्व से की थी।
*भीतरघात: किसे कितना नुकसान* ?
भीतरघात दोनों दलों में था, पर प्रकृति अलग थी।
भाजपा का “भीतरघात” चुनाव शुरू होते ही “चौराहे पर आ गया” और एक नरैटिव व परसेप्शन बनकर सार्वजनिक विमर्श का विषय बन गया। वहीं कांग्रेस का भीतरघात संगठन की चारदीवारी के “भीतर” ही रहा।
*आंकड़े क्या कहते हैं?*
आंकड़ों की भाषा अक्सर राजनीति की सबसे “निष्पक्ष” भाषा होती है।
इस उपचुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में 19,345 मत कम पड़े। कांग्रेस 6,016 मतों से विजयी रही, जबकि पिछली बार जीत का अंतर 7,742 मत था। यानी जीत का अंतर 1,726 मत घट गया। प्रतिशत में भी विजय अंतर 4.41% से घटकर 3.82% रह गया।
पिछले चुनाव की तुलना में कांग्रेस को 22,220 मत कम मिले, जबकि भाजपा के मत 20,494 कम हुए। इस लिहाज से भाजपा ने 1,726 मतों की सापेक्ष बढ़त बनाई।
निर्दलीय प्रत्याशी यादव को 22,527 मत (14.3%) मिले, जबकि पिछले चुनाव में निर्दलीय को मात्र 490 मत मिले थे। सबसे बड़ा सवाल: इन 22 हजार से अधिक मतों में भाजपा और कांग्रेस के असंतुष्ट मतदाताओं का अनुपात कितना था?
एक और रोचक तथ्य: पिछले चुनाव में NOTA को 1,452 मत मिले थे, इस बार घटकर 456 रह गए। लगभग हजार मतों की यह कमी कांग्रेस के प्रति “सकारात्मक झुकाव” का संकेत भी मानी जा सकती है।
*क्या मोहन सरकार के प्रदर्शन पर प्रश्नचिन्ह* ?
ढाई वर्ष के कार्यकाल में यह मोहन सरकार की दूसरी उपचुनावी हार है। स्वाभाविक है सरकार और संगठन दोनों के नेतृत्व पर सवाल उठते हैं।
क्या नेतृत्व सिर्फ स्थानीय कार्यकर्ताओं और भीतरघात को जिम्मेदार ठहराकर “पल्ला झाड़” लेगा, या आत्ममंथन करेगा कि कहीं प्रदेश नेतृत्व के निर्णय और चुनावी प्रबंधन की कमजोरियां ही हार का प्रमुख कारण तो नहीं?
क्या यह भी स्पष्ट होगा कि तीन बार चुनाव लड़ चुके नरोत्तम मिश्रा का टिकट किन ठोस कारणों से कटा? कार्यकर्ताओं का विश्वास पुनः अर्जित करने के लिए इस विषय पर कोई “श्वेत पत्र” जारी किया जाएगा?
*भाजपा: भविष्य के लिए आवश्यक कदम*
भाजपा के पास अभी पर्याप्त समय है कि वह कमियों को दूर कर 2028 की तैयारी में जुट जाए।
इसी संदर्भ में RSS की शाखा में नियमित जाने वाले एक पाठक की मुझे भेजी गई टिप्पणी उल्लेखनीय है –
“हार के कारण – UGC, आरक्षण, भ्रष्टाचार, रोड, E-20, पेट्रोल, ज्यादा टैक्स, बेईमान मंत्री, खराब लॉ एंड ऑर्डर – सुधरो या मरो।”
इन शब्दों में तीनों उपचुनावों के परिणामों का सार है। इसमें यदि “जैन जी” आंदोलन व युवा आक्रोश को भी जोड़ दें तो तस्वीर और साफ हो जाती है।
कई बार प्रबुद्ध पाठक कुछ शब्दों में वह बात कह देता है जिसे समझाने के लिए स्तंभकारों को कई पृष्ठ लिखने पड़ते हैं।
दो हार व एक जीत की मार्जिन कम होने के इन कारणों पर यदि तीनों प्रदेशों की भाजपा सरकार और संगठन “मनन, चिंतन और आत्मावलोकन” कर निष्कर्ष को जमीन पर उतारेंगे, तो सत्ता में वापसी का मार्ग फिर खुल सकता है। अन्यथा “अवसर हाथ से निकल जाएगा”।

Leave A Reply

Your email address will not be published.