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भक्ति और साहित्य का संगम, भद्रेशदास स्वामी को मिला सरस्वती सम्मान

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बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था के विद्वान संत महामहोपाध्याय भद्रेशदास स्वामीजी को उनके संस्कृत ग्रंथ स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा (2022) के लिए देश का प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान 2024 प्रदान किया गया. यह पहली बार है जब केके बिड़ला फाउंडेशन द्वारा दिये जाने वाला पुरस्कार किसी संत को मिला है और 22 वर्षों बाद किसी संस्कृत कृति को यह सम्मान प्राप्त हुआ है.

अहमदाबाद स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर, शाहीबाग में आयोजित भव्य समारोह में गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, अवार्ड चयन समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अर्जुन कुमार सिकरी, कई विश्वविद्यालयों के कुलपति तथा हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे.

न्यायमूर्ति अर्जुन कुमार सिकरी ने अपने संबोधन में कहा: 22 भाषाओं की पुस्तकों की समीक्षा के बाद यह ग्रंथ सर्वोच्च और अद्वितीय सिद्ध हुआ. भद्रेशदास स्वामी को सम्मानित करके ऐसा लगता है मानो पुरस्कार स्वयं ही गौरवान्वित हुआ है.

संस्कृत ग्रंथ स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा के लिए मिला सम्मान

स्वामीजी ने यह सम्मान अपने गुरुवर्य श्रीप्रभु स्वामी महाराज और महंत स्वामी महाराज को समर्पित करते हुए कहा: यह मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए एक पवित्र जिम्मेदारी है.

बीएपीएस के वरिष्ठ संत पूज्य ब्रह्मविहारिदास स्वामी ने कहा, यह सम्मान केवल एक संत का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय साधु समाज का है. इसका प्रभाव केवल साहित्यिक नहीं यह सभ्यतागत है.

सरस्वती सम्मान, केके बिड़ला फाउंडेशन द्वारा 1991 से प्रतिवर्ष दिया जाने वाला भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है. इसमें प्रशस्तिपत्र, स्मृति-चिह्न और 15 लाख रुपये की पुरस्कार राशि सम्मिलित होती है.

स्वामीनारायण सिद्धांत सुधा ग्रंथ अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन को वेदांत के सिद्धांतों के साथ तार्किक और गहन शैली में प्रस्तुत करता है तथा समानता, ज्ञान और मुक्ति के मूल्यों को प्रोत्साहित करता है. यह ऐतिहासिक सम्मान संस्कृत की शाश्वत महिमा को उजागर करते हुए भारतीय दर्शन को वैश्विक स्तर पर गौरव दिलाने वाला बना है.

सरस्वती सम्मान: भारत का सर्वोच्च साहित्यिक गौरव

यह पुरस्कार 1991 में केके बिड़ला फाउंडेशन द्वारा स्थापित किया गया था और आज यह देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मानों में गिना जाता है. सरस्वती सम्मान केवल एक साहित्यिक पुरस्कार नहीं है, बल्कि भारत की सृजनात्मकता, भाषाई विविधता और शाश्वत ज्ञान का उत्सव है.

सर्वोच्च साहित्यिक मान्यता: पिछले दस वर्षों में प्रकाशित 22 भाषाओं में से किसी भी भाषा की श्रेष्ठ कृति को प्रतिवर्ष यह सम्मान दिया जाता है.

भाषाई विविधता का उत्सव: यह सम्मान केवल हिंदी या अंग्रेजी तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृत, तमिल, बांग्ला, मलयालम, उड़िया जैसी सभी भारतीय भाषाओं को गौरव देता है.

गौरव के साथ सम्मान: इस पुरस्कार में प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह और ₹15 लाख की धनराशि प्रदान की जाती है, किंतु इसका असली मूल्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा है.

शाश्वत और आधुनिक साहित्य: यह सम्मान आधुनिक कवियों, उपन्यासकारों और निबंधकारों के साथ-साथ संस्कृत के दार्शनिक ग्रंथों को भी दिया गया है. 2024 में महामहोपाध्याय भद्रेशदास स्वामीजी को दिया गया सम्मान इसका हाल का उदाहरण है.

भारतीय ज्ञान परंपरा का रक्षक: यह पुरस्कार उन कृतियों को मान्यता देता है जो दार्शनिक गहराई, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक मूल्यों को उजागर करती हैं, जिससे साहित्य नई पीढ़ी को प्रेरित करता है.

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