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Jabalpur News: कीचड़ भरे रास्ते पर तड़पकर हुई डिलीवरी, गुस्साए पूरे गांव ने फावड़ा उठाकर खुद बना डाली 2 किमी सड़क

जबलपुर (मध्य प्रदेश): जबलपुर जिला मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर शहपुरा जनपद के अंतर्गत चिरापोड़ी ग्राम पंचायत के दुर्गानगर गांव से मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक उपेक्षा की दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है।

गांव की बदहाल, दलदल भरी सड़क के कारण जब एक गर्भवती महिला रामकली बाई को तेज प्रसव पीड़ा के दौरान अस्पताल ले जाया जा रहा था, तो कीचड़ में न तो कोई एंबुलेंस आ सकी और न ही कोई चारपहिया वाहन। परिजनों को मजबूरन उसे दलदल भरे रास्ते पर पैदल ले जाना पड़ा, जिसके चलते अस्पताल पहुँचने से पहले ही खुले आसमान के नीचे कीचड़ में महिला का प्रसव हो गया। बिना किसी डॉक्टर और जीवनरक्षक सुविधा के जच्चा-बच्चा की जान सांसत में फंसी रही। गनीमत रही कि दोनों सुरक्षित बच गए, लेकिन इस दर्दनाक मंजर ने पूरे गांव की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया।

💪 ‘अब नहीं सहेंगे दर्द’: फावड़ा-तसला उठाकर 2 किमी सड़क बनाने में जुटा पूरा गांव

प्रशासनिक विफलता के बाद ग्रामीणों का ऐतिहासिक श्रमदान:

  • सड़क निर्माण का बीड़ा: सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुके ग्रामीणों ने फैसला किया कि अब वे किसी घोषणा या वादे के भरोसे नहीं बैठेंगे।

  • महिलाओं और बच्चों की भागीदारी: गांव की 100 से अधिक महिलाएं, 50 पुरुष और करीब 25 छोटे-छोटे बच्चे हाथों में फावड़ा, तसला और कुदाल लेकर 2 किलोमीटर लंबी कच्ची सड़क को मोटरेबल बनाने में जुटे हैं।

  • निजी खर्च से मुरम और पत्थर: ग्रामीण अपने सीमित संसाधनों और चंदे से मुरम-पत्थर खरीदकर गड्ढों और दलदल वाले हिस्सों को पाट रहे हैं ताकि कम से कम पैदल और दोपहिया वाहनों की आवाजाही संभव हो सके।

  • एकजुटता की मिसाल: रामकली के आंसुओं और संघर्ष को प्रेरणा बनाकर ग्रामीण यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भविष्य में किसी अन्य गर्भवती महिला या बीमार व्यक्ति को ऐसा अमानवीय दर्द न झेलना पड़े।

🌊 35 वर्ष पूर्व बरगी बांध के लिए दी थी जमीन: विस्थापन के बाद भी बुनियादी सुविधाओं को तरसे

विस्थापित परिवारों की अनसुनी दास्तान:

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: लगभग 35 वर्ष पूर्व जबलपुर के विशाल बरगी बांध परियोजना के निर्माण के लिए जबलपुर, मंडला और सिवनी जिलों के आदिवासी परिवारों ने अपने पुरखों की जमीन और घर-बार कुर्बान कर दिए थे।

  • दुर्गानगर में पुनर्वास: लगभग 90 से अधिक परिवारों और 1,200 की आबादी वाले इस गांव को उम्मीद थी कि पुनर्वास के बाद उनका जीवन स्तर सुधरेगा।

  • पूर्ण गांव का दर्जा नहीं: साढ़े तीन दशक बीत जाने के बावजूद कागजों पर इसे आज भी राजस्व गांव के बजाय महज वन ग्राम या ‘टोला’ माना जाता है, जिससे विकास कार्य नियमों की पेचीदगियों में उलझे रहते हैं।

  • पेयजल का घोर संकट: गांव में नल-जल योजना की समयसीमा 2024 से बढ़ाकर 2027 कर दी गई है और लोग 100 रुपये देकर निजी बोरवेल से पानी खरीदने को विवश हैं।

🏫 स्वास्थ्य सेवाएं ठप और शिक्षा व्यवस्था चरमराई: रिश्तेदारियों में भी पड़ रही दरार

गांव के सामाजिक और दैनिक जीवन पर पड़ा प्रभाव:

  • अस्पताल के अभाव में विवशता: प्रसव की तारीख नजदीक आते ही महिलाओं को 15 दिन पहले ही दूसरे गांवों में रिश्तेदारों के यहां शरण लेनी पड़ती है; हाल ही में पांच महिलाओं को दूसरे गांव भेजना पड़ा था।

  • जर्जर स्कूल और अधूरी पढ़ाई: गांव का प्राथमिक विद्यालय भवन पांच साल पहले ध्वस्त हो चुका है; अब एक छोटे से कमरे में स्कूल और आंगनवाड़ी दोनों संचालित होते हैं। 5वीं के बाद कीचड़ के कारण बच्चे दूसरे गांव पढ़ने नहीं जा पाते।

  • रिश्ते तय होने में बाधा: बदहाल कनेक्टिविटी के चलते दूसरे गांवों के लोग दुर्गानगर में वैवाहिक संबंध जोड़ने से कतराते हैं, जिससे युवाओं का सामाजिक जीवन भी प्रभावित हो रहा है।

  • शिक्षकों की परेशानी: स्कूल के प्राथमिक शिक्षक योगेश पारदी ने बताया कि फिसलन और कीचड़ के कारण रोज कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचना जान जोखिम में डालने जैसा है।

🏛️ विधायक निधि की सीमा और प्रशासनिक आश्वासन: सुगम संपर्कता से बनेगी बात?

नेताओं और अधिकारियों का आधिकारिक रुख:

  • बरगी विधायक नीरज सिंह का पक्ष: विधायक ने स्पष्ट किया कि दुर्गानगर वन ग्राम के दायरे में आता है, जिसके चलते सामान्य पंचायत या नगरीय मद से काम कराने में विधिक बाध्यताएं हैं। सड़क का अनुमानित खर्च 30 से 40 लाख रुपये है। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे वन विभाग, जिला प्रशासन और मुख्यमंत्री स्तर पर बात कर जनभागीदारी के साथ राशि जोड़कर सड़क बनवाने का प्रयास करेंगे।

  • जिला पंचायत सीईओ अभिषेक गहलोत का बयान: सीईओ ने प्रकरण का संज्ञान लेते हुए कहा कि सड़क की आवश्यकता की जांच कराई जाएगी। यदि सड़क प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY/MPRRDA) के मानकों में नहीं आती, तो इसे ‘सुगम संपर्कता योजना’ अथवा अन्य शासकीय मदों से स्वीकृत कराने की ठोस रूपरेखा तैयार की जाएगी।

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