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हाईकोर्ट का आदेश बना नज़ीर: डीजीपी को निर्देश — बैतूल के आबकारी केस से शुरू हुआ बड़ा बदलाव

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बैतूल। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश में पुलिस की अधूरी रिपोर्टिंग पर कड़ी नाराज़गी जताई और राज्य के डीजीपी को निर्देश दिया है कि सभी जिलों में अब किसी भी आरोपी की आपराधिक जानकारी पूर्ण और अद्यतन रूप में ही अदालतों को दी जाए। आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि रिपोर्ट में यह दर्ज होना चाहिए कि कौन-से मामले लंबित हैं, कौन-से निपट चुके हैं और उनके परिणाम क्या रहे।

 

यह आदेश बैतूल निवासी विजय अतुलकर से जुड़े मामले (CRR No. 4057/2025) की सुनवाई के दौरान आया। विजय अतुलकर को एम.पी. आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत एक वर्ष के कठोर कारावास और ₹25,000 जुर्माने की सज़ा दी गई थी। उन्होंने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

 

लेकिन पुलिस द्वारा अधूरी आपराधिक जानकारी पेश किए जाने और रिपोर्ट पूरी न देने के कारण उनकी बेल अर्जी करीब तीन महीने तक लंबित रही। विजय अतुलकर इस दौरान जेल में ही रहे और अदालत बार-बार राज्य से रिपोर्ट मंगवाती रही।

 

राज्य की ओर से कहा गया कि आरोपी पर नौ आपराधिक मामले दर्ज हैं, परंतु बचाव पक्ष ने बताया कि पुलिस ने अधूरी जानकारी दी है, क्योंकि अतुलकर को पहले ही पाँच आबकारी मामलों में बरी किया जा चुका है। अदालत ने पाया कि थाना आमला के टीआई ने यह तथ्य रिपोर्ट में नहीं बताया।

 

न्यायमूर्ति अवनिन्द्र कुमार सिंह ने टिप्पणी की —

 

> “अधूरी क्रिमिनल रिपोर्टिंग न्याय की प्रक्रिया में मदद नहीं, बल्कि बाधा बनती है। जहाँ अभियुक्त बरी हो चुका हो, वहाँ केवल क्रिमिनल हिस्ट्री दिखाकर सत्य छिपाना अनुचित है।”

 

अदालत ने कहा कि इस तरह की अधूरी जानकारी बेल सुनवाई को लंबा करती है और आरोपी के संविधान प्रदत्त अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के अधिकार का उल्लंघन करती है।

 

इसी आधार पर अदालत ने डीजीपी (पुलिस महानिदेशक) को निर्देश दिया कि वे सभी जिला पुलिस अधीक्षकों (SP) को आदेश जारी करें कि भविष्य में जब भी कोर्ट या सरकारी वकील किसी अभियुक्त की आपराधिक जानकारी मांगे, तो रिपोर्ट में हर केस का पूरा विवरण और परिणाम (Conviction/Acquittal) दर्ज किया जाए।

 

अदालत ने यह भी कहा कि कोर्ट मोहारीर रोज़ाना केस परिणाम की रिपोर्ट एसपी कार्यालय भेजता है और यह जानकारी कलेक्टर को भी मिलती है, इसलिए “परिणाम ज्ञात नहीं” जैसी दलील असंगत है।

 

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शुभम कुमार मिश्रा ने कहा —

 

> “यह आदेश पुलिस प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। अब अधूरी क्रिमिनल हिस्ट्री दिखाकर जमानत मामलों को लटकाना संभव नहीं होगा।”

 

इस केस को हाईकोर्ट तक ले जाने वाले अधिवक्ता राजेंद्र उपाध्याय ने बताया कि आमला के विजय के खिलाफ पुलिस ने आबकारी एक्ट का मामला दर्ज किया था। इस मामले में निचली अदालत ने उसे एक साल की सजा दी थी। इसकी अपील सेशन कोर्ट में की गई थी। लेकिन वहां भी सजा यथावत रखी गई। इसी के रिवीजन के हाईकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की थी। जिसमें 9 सितम्बर 25 को कोर्ट ने रिकॉर्ड काल किया था। इसके बाद जमानत पर सुनवाई होनी थी।शासन के वकील ने क्रिमिनल रिकॉर्ड मांग लिया। अगली सुनवाई पर उन्होंने बताया कि उन पर छ मामले दर्ज है। हमने इस पर समय मांगा। हमने कोर्ट को बताया कि वह छह से 5 में बरी हो गया। शासन के वकील बार बार समय मांग रहे थे। जिससे विजय रूप से जेल में परेशान हो रहा था। हमने कोर्ट को बताया कि पुलिस जमानत को डिले करने के लिए ऐसा कर रहे है।इस पर न्यायालय ने संज्ञान लिया और डीजीपी को निर्देश जारी किए ।

 

 

मामले का सारांश

 

* मामला: CRR No. 4057 / 2025

* शीर्षक: विजय अतुलकर बनाम मध्यप्रदेश शासन

* आदेश दिनांक: 20 नवंबर 2025

* अदालत: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर

* पीठासीन न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति अवनिन्द्र कुमार सिंह

* याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: शुभम कुमार मिश्रा

* आरोपी तीन माह से बेल की प्रतीक्षा में जेल में था; पुलिस रिपोर्ट न देने से सुनवाई विलंबित हुई।

* हाईकोर्ट ने सजा निलंबित कर ₹50,000 के मुचलके और उतनी ही राशि की जमानत पर रिहाई के आदेश दिए।

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