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बैतूल में पीएम स्वनिधि योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा — कागजों में तीन बार लोन स्वीकृत, लाभार्थी को एक रुपया भी नहीं मिला

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बैंक के सीबीएस पोर्टल पर नहीं हुआ डिस्बर्समेंट, लेकिन सरकारी पोर्टल पर दिखाया लोन जारी और चुकता — DLCC बैठकों में भी उठ चुका मामला
बैतूल। प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना (PM SVANidhi) में बैतूल जिले से बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। योजना का उद्देश्य छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी व्यवसायियों को आत्मनिर्भर बनाना था, लेकिन अब यह योजना बैंकिंग सिस्टम की अपारदर्शिता और लापरवाही का शिकार होती दिख रही है।
नगर पालिका बैतूल अंतर्गत एक ऐसा मामला उजागर हुआ है, जिसमें लाभार्थी सतीश मिश्रेकर के नाम पर तीन बार लोन स्वीकृत दिखाया गया, तीनों बार चुकता भी दर्शाया गया, लेकिन वास्तविक लाभार्थी को अब तक एक भी रुपया नहीं मिला।
सतीश, जो पेशे से मोटर मैकेनिक हैं, ने बताया कि वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई पीएम स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि योजना के तहत उन्होंने आवेदन किया था।
जुलाई 2020 में पंजाब नेशनल बैंक से उनके नाम पर ₹10,000 का लोन स्वीकृत हुआ और कागजों में 5 नवंबर 2020 तक चुकता भी दिखा दिया गया।
इसके बाद 25 अगस्त 2023 को ₹20,000 का दूसरा लोन और अब 8 नवंबर 2025 को ₹50,000 का तीसरा लोन स्वीकृत बताया गया — लेकिन सतीश को इन तीनों में से किसी का भी पैसा नहीं मिला।
जब सतीश जानकारी लेने बैंक पहुंचे, तो **बैंक प्रबंधक खुद यह नहीं बता पाए** कि लाभार्थी को बिना पैसा दिए ही ऋण जारी और चुकता कैसे दिखा दिया गया।
योजना के पोर्टल पर तो लोन स्वीकृत और भुगतान दिखाया गया, लेकिन **बैंक के CBS (कोर बैंकिंग सिस्टम)** में ऋण का कोई डिस्बर्समेंट दर्ज ही नहीं है।
**जिला शहरी परियोजना के प्रबंधक हंसराज मस्तकर** ने बताया कि सतीश जैसा एक-दो और मामले सामने आए हैं, जिनमें बैंक ने पीएम स्वनिधि पोर्टल पर तो लोन दिखाया, लेकिन वास्तविक रूप से भुगतान किया ही नहीं।
उन्होंने कहा कि इस विषय को **DLCC (District Level Coordination Committee)** की बैठकों में भी उठाया गया है कि कई बैंकें भ्रामक जानकारी दे रही हैं।
मस्तकर ने बताया — *”बैंक सरकार को भी गुमराह कर रहे हैं और हितग्राहियों को भी धोखा दे रहे हैं। वे अपने CBS पोर्टल पर लोन डिस्बर्स ही नहीं करते, लेकिन पीएम स्वनिधि के सरकारी पोर्टल पर लोन जारी और चुकता दिखा देते हैं।”*
इस मामले ने न केवल बैंकिंग सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना की साख पर भी दाग लगा दिया है। गरीबों की आत्मनिर्भरता के नाम पर चल रही योजना में यदि इस तरह के फर्जीवाड़े हो रहे हैं, तो यह प्रशासनिक निगरानी की विफलता को भी उजागर करता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि —
👉 जब लाभार्थी को लोन मिला ही नहीं, तो दस्तावेजों में किसने लिया और किसने चुका दिया?
👉 क्या यह तकनीकी हेराफेरी है या किसी संगठित स्तर पर किया गया वित्तीय खेल?
स्थानीय प्रशासन और बैंकिंग नियंत्रण प्राधिकरणों को अब इस प्रकरण की गहन जांच करनी होगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि गरीबों के नाम पर कौन खेल खेल रहा है — सिस्टम की त्रुटि से या साज़िश से।
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