Logo
ब्रेकिंग
धमतरी में शराबी शिक्षक पर एक्शन, बिना बताए छुट्टी और अनुशासनहीनता पर लोक शिक्षण संचालनालय ने किया सस... शरिया अदालतें कानूनन कोर्ट नहीं: बिलासपुर हाईकोर्ट ने रद्द किया इदारा-ए-शरिया का तलाक आदेश तेज बारिश में डूबा सिंगापुर टाउनशिप का नया अंडरपास: करोड़ों रुपये खर्च के बाद भी हालात जस के तस Gwalior Cyber Fraud: ट्रक चालक के साथ 4.50 लाख की साइबर ठगी, मोबाइल अचानक बंद होते ही बैंक खाते से उ... 'ऑपरेशन मैट्रिक्स' के तहत क्राइम ब्रांच का बड़ा एक्शन: 13 राज्यों में फैला था ठगी का जाल Damoh News: शराब पीने के बाद 25 वर्षीय युवक के मुंह से निकला झाग, गंभीर हालत में जबलपुर रेफर; गांव म... जबलपुर के लोक कलाकार देवेन्दर सिंह ग्रोवर की अनोखी पहल: 'श्री जानकी बैंड' से संवर रहीं जिंदगियां जबलपुर के लोक कलाकार देवेन्दर सिंह ग्रोवर की अनोखी पहल: 'श्री जानकी बैंड' से संवर रहीं जिंदगियां सीएम हाउस घेराव पर पुलिस से झड़प, देर रात तक कमला पार्क पर डटे रहे इंटर्न; प्रदेशभर में ओपीडी ठप करन... इंदौर में राहुल गांधी के कार्यक्रम पर सस्पेंस: आयोजन स्थल तय न होने से बढ़ी कांग्रेस की मुश्किलें
Header Ad

दिल्ली में वायु गुणवत्ता मानकों को समय पर पाना जरूरी: 2040 तक 20% घट सकता है PM2.5 का बोझ

नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण एक गंभीर और दीर्घकालिक समस्या बना हुआ है, जिसका सीधा और घातक असर आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।

प्रदूषण नियंत्रण के लिए विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर किए जा रहे प्रयासों के बीच संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक नई रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यदि दिल्ली वर्ष 2026 से तय समय-सीमा के भीतर वर्तमान राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को प्राप्त कर लेती है, तो वर्ष 2040 तक PM2.5 के संपर्क में आने का संचयी बोझ 20 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। वहीं दूसरी ओर, यदि इन मानकों को हासिल करने में लगभग आठ वर्षों की देरी होती है, तो यह कमी घटकर मात्र 10 प्रतिशत रह जाएगी, जिसके चलते इस अवधि में लोगों के स्वास्थ्य पर बेहद गंभीर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलेगा।

📊 UNEP और CCAC ने जारी की ‘हिडन एसेट्स’ रिपोर्ट: पहला व्यापक वैश्विक आकलन

वैश्विक रिपोर्ट का विमोचन और मुख्य उद्देश्य:

  • रिपोर्ट का विमोचन: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और क्लाइमेट एंड क्लीन एयर कोएलिशन (CCAC) की ओर से 7 सितंबर को ‘हिडन एसेट्स: द इकोनॉमिक एंड हेल्थ केस फॉर क्लाइमेट एंड क्लीन एयर एक्शन’ शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की गई।

  • पहला व्यापक आकलन: यह रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण से एक साथ निपटने के आर्थिक और स्वास्थ्य प्रभावों का दुनिया भर में पहला व्यापक वैश्विक आकलन प्रस्तुत करती है।

🌱 प्रदूषण और जलवायु संकट से निपटने के 25 ठोस उपाय: वैश्विक GDP को होगा भारी लाभ

सुझाए गए प्रमुख उपाय और आर्थिक प्रभाव:

  • 25 प्राथमिक उपाय: रिपोर्ट में दोनों संकटों से एक साथ निपटने के लिए 25 प्रमुख रणनीतिक समाधान सुझाए गए हैं। इनमें नवीकरणीय (अक्षय) ऊर्जा को बढ़ावा देना, ऊर्जा दक्षता में सुधार करना, स्वच्छ ईंधन आधारित खाना पकाने व हीटिंग के साधनों का विस्तार करना तथा वाहनों के उत्सर्जन और ईंधन दक्षता मानकों को अत्यधिक कड़ा करना शामिल है।

  • वैश्विक GDP को फायदा: इन 25 उपायों को प्रभावी रूप से लागू करने से वर्ष 2035 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को मिलने वाला सालाना लाभ दुनिया की कुल GDP के 2.8 प्रतिशत के बराबर हो सकता है। यह आंकड़ा 2050 में 4.5 प्रतिशत और वर्ष 2100 तक बढ़कर 11.4 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।

⚠️ हर साल की देरी से होगा 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान: रिपोर्ट की चेतावनी

नीतिगत देरी के गंभीर परिणाम:

  • आर्थिक नुकसान: रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि कार्यान्वयन में प्रत्येक वर्ष की देरी वैश्विक स्तर पर जीडीपी के 0.5 प्रतिशत से अधिक के संभावित आर्थिक लाभ को समाप्त कर सकती है, जो बाजार और गैर-बाजार दोनों लाभों को मिलाकर 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की क्षति के बराबर है।

  • दशक भर पहले क्रियान्वयन का लाभ: यदि आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी और संस्थागत परिस्थितियों को सुदृढ़ किया जाए, तो इन सभी 25 समाधानों को निर्धारित समय से एक दशक पहले भी पूरी तरह लागू किया जा सकता है। इससे वर्ष 2025 से 2050 की अवधि के दौरान PM2.5 और ओजोन अग्रदूतों में कमी की गति काफी तेज हो जाएगी।

🏛️ संस्थागत अड़चनें बनीं सबसे बड़ा रोड़ा: 2035 तक उत्सर्जन कटौती आधी रह जाने का खतरा

कार्यान्वयन में आने वाली बाधाएं:

  • संस्थागत विफलताएं: रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि वैश्विक स्तर पर नीतियों को धरातल पर उतारने में औसतन 7.5 से 8 वर्षों की देरी होने की संभावना रहती है। इसमें सबसे बड़ा योगदान संस्थागत बाधाओं और लालफीताशाही का है, जो 15 वर्षों की काल्पनिक कार्यान्वयन अवधि में लगभग 2.4 वर्षों के विलंब के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

  • उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य प्रभावित: रिपोर्ट के अनुसार, यदि इस स्तर की प्रशासनिक व संस्थागत देरी जारी रहती है, तो वर्ष 2035 तक हासिल की जा सकने वाली लक्षित उत्सर्जन कटौती घटकर लगभग आधी रह जाएगी।

Comments are closed.