Logo
ब्रेकिंग
फोन नहीं उठाते सीईओ,मीडियाकर्मियों में नाराजगी,ज्ञापन सौंपा Ola Uber Ban Chandigarh: ओला-उबर के लाइसेंस रद्द होने के बाद शुरू हुई 'भारत टैक्सी', जानिए यात्रियों... Haryana News: लगातार चौथी बार देश में अव्वल रही करनाल शुगर मिल, केंद्रीय मंत्रियों ने दी प्रतिष्ठित ... NCC DG Team Selection: हरियाणा के होनहार शूटर विजयन्त ढाण्डा ने बढ़ाया राज्य का मान, देश के टॉप-12 शू... Haryana Road Mishap: नूंह सड़क हादसे में चार लोगों की मौत, पत्नी गंभीर रूप से घायल; पुलिस जांच में ज... Haryana Crime News: पानीपत में اغवा हुआ बच्चा बरामद, एक लाख में बेचने की थी डील; पुलिस ने दो को दबोच... Gurnam Singh Chaduni Mahapanchayat: धान खरीद की मांग पर अड़े किसान, हाईवे पर बीती रात; आज होगी बड़ी ... Patna Mithila Colony Incident: दानापुर में खूनी संघर्ष, शादी से पहले सिपाही भाई ने की आत्महत्या, पुल... Delhi Demolition News: शालीमार बाग मैक्स अस्पताल रोड पर देर रात चला पीला पंजा; भारी पुलिस बल तैनात, ... Monsoon Update 2026: मॉनसून की विदाई के बीच बिगड़ेगा मौसम; मध्य प्रदेश, ओडिशा और पूर्वोत्तर में भारी...
Header Ad

शरिया अदालतें कानूनन कोर्ट नहीं: बिलासपुर हाईकोर्ट ने रद्द किया इदारा-ए-शरिया का तलाक आदेश

बिलासपुर (छत्तीसगढ़): मुस्लिम महिला के वैवाहिक और कानूनी अधिकारों से जुड़े एक संवेदनशील मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या स्वयं को शरिया कोर्ट घोषित करने वाला संगठन कानून द्वारा स्थापित अदालत का दर्जा प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसी संस्थाएं न तो किसी महिला के वैवाहिक दर्जे का न्यायिक निर्धारण कर सकती हैं और न ही विवाह विच्छेद (तलाक) की कोई विधिक घोषणा कर सकती हैं।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने इस संदर्भ में रायपुर के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट द्वारा 18 जनवरी 2022 को जारी उस आदेश को पूर्णतः अधिकारहीन (Void) घोषित कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश किसी वैधानिक न्यायिक व्यवस्था से जारी नहीं हुआ है, इसलिए इससे न तो निकाह समाप्त माना जाएगा और न ही किसी पक्ष के कानूनी अधिकारों, स्थिति या दायित्वों में कोई बदलाव आएगा।

📜 वैवाहिक विवाद से लेकर FIR तक का पूरा मामला: जानिए क्या था पूरा घटनाक्रम

मामले की पृष्ठभूमि और पारिवारिक विवाद:

  • पुनर्विवाह और विवाद: टिकरापारा (रायपुर) निवासी याचिकाकर्ता निरोश अब्बासी के पहले पति की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद 18 जुलाई 2020 को उनका निकाह मोहम्मद आबिद खान से हुआ। विवाह के बाद बच्चों के नए परिवार में समायोजन को लेकर दोनों पक्षों में विवाद शुरू हो गया।

  • तलाक-ए-अहसन का दावा: याचिकाकर्ता के अनुसार, विवाद बढ़ने पर पति द्वारा तलाक देने की प्रक्रिया शुरू की गई। पति का दावा था कि उसने ‘तलाक-ए-अहसन’ के तहत तीन चरणों में (31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को) संचार माध्यमों से तलाक की घोषणा की थी।

  • दहेज प्रताड़ना का केस: पीड़िता ने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई। वन स्टॉप सखी सेंटर में काउंसिलिंग विफल होने पर 1 नवंबर 2021 को महिला थाना रायपुर में आईपीसी की धारा 498-ए और 34 के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई।

🏛️ सुप्रीम कोर्ट के नजीर का दिया हवाला: दारुल कजा और फतवे अदालती फैसले नहीं

सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का उल्लेख:

  • विश्व लोचन मदन केस का संदर्भ: हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ का प्रमुखता से उल्लेख किया।

  • कानूनी मान्यता का अभाव: अदालत ने दोहराया कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली संस्थाएं कानून से स्थापित अदालतें नहीं हैं। इनके द्वारा दिए गए निर्णय या राय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया की तरह लागू नहीं कराया जा सकता।

  • केवल व्यक्तिगत राय तक सीमित: धार्मिक संस्थाएं केवल व्यक्तिगत धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन यह राय किसी भी नागरिक के नागरिक और वैधानिक अधिकारों को प्रभावित या समाप्त नहीं कर सकती।

🛡️ आपराधिक मामले पर नहीं पड़ेगा असर: याचिका आंशिक रूप से स्वीकार

हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय और दिशा-निर्देश:

  • आदेश अधिकारहीन घोषित: हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया के 18 जनवरी 2022 के तलाक संबंधी फैसले को कानूनी मान्यता से रहित ठहराया।

  • आपराधिक जांच अप्रभावित: पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का पुलिस में दर्ज एफआईआर, दहेज प्रताड़ना के केस या पक्षकारों द्वारा उठाए गए अन्य विधिक उपायों पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा।

  • कानून के तहत होगी आगे की कार्रवाई: सभी आपराधिक और पारिवारिक कानूनी अधिकारों का निर्धारण सक्षम न्यायिक अदालतें और प्राधिकारी कानून के स्थापित नियमों के तहत ही करेंगे।

Comments are closed.