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क्या बांके बिहारी को गोस्वामी समाज ले जा सकते हैं अपने साथ… आखिर महाराज ही नहीं रहेंगे तो मंदिर का क्या होगा?

उत्तर प्रदेश के मथुरा में स्थित ठाकुर बांके बिहारी मंदिर सालों से हिंदुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. यूपी सरकार की ओर से यहां कॉरिडोर बनाने की तैयारी है और इसको लेकर अध्यादेश भी जारी कर दिया गया है. लेकिन गोस्वामी समाज इस अध्यादेश को मानने को बिल्कुल तैयार नहीं है और इसका लगातार विरोध कर रहा है.

गोस्वामी समाज की रविवार को एक बैठक हुई. इस बैठक में गोस्वामी समाज ने सरकार के अफसरों को चेताते हुए कहा कि आपको मंदिर चाहिए, ले लो. जगह चाहिए, ले लो…मंदिर का पैसा चाहिए, वो भी ले लो और आराम से कॉरिडोर बनाओ. ठाकुर बांके बिहारी महाराज हमारे हैं. हमारे थे और हमारे रहेंगे. गोस्वामी समाज उनको लेकर परिवार सहित यहां से पलायन कर जाएगा.

अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर गोस्वामी समाज किस आधार पर ऐसा बोल रहा है कि ठाकुर बांके बिहारी महाराज को हम अपने साथ ले जाएंगे? क्या ठाकुर बांके बिहारी गोस्वामी समाज के ही हैं, अन्य किसी और के नहीं हैं? जब मंदिर सार्वजनिक है, वहां आने वाले श्रद्धालु अलग-अलग जातियों के हैं, तो ऐसे में बांके बिहारी किसी एक समुदाय के कैसे हो सकते हैं?

ठाकुर बांके बिहारी महाराज कैसे हुए प्रकट?

जब स्वामी हरिदास महाराज अपनी भजन साधना स्थली में लीन रहते थे, तभी उन्होंने ठाकुर बांके बिहारी महाराज को अपनी भजन साधना से प्रसन्न कर प्रकट किया. ठाकुर बांके बिहारी महाराज ने उन्हें दर्शन दिए थे, तब से ठाकुर बांके बिहारी महाराज की सेवा स्वामी हरिदास महाराज करते रहे और उनके वंशज रहे गोस्वामी समाज आज भी उन्हीं की सेवा कर रहे हैं.

अब सेवा को कैसे समझा जाए?

स्वामी हरिदास महाराज तीन भाई थे. जिनमें सबसे बड़े भाई स्वामी हरिदास जी महाराज, दूसरे जगन्नाथ और तीसरे नंबर पर श्री गोविंद महाराज थे. इन तीनों भाइयों में सिर्फ श्री जगन्नाथ महाराज की तीन संतानें थीं, जिन्हें बांके बिहारी महाराज की सेवा का अधिकार मिला. इनमें से तीनों समय की सेवा अलग-अलग बांट दी गईं. पहले शृंगार सेवा, दूसरा राजभोग सेवा और तीसरा शयन भोग सेवा.

जब यह सेवा बांटी गई तो शृंगार सेवा के अधिकारी श्री जगन्नाथ स्वामी के पुत्र थे. उनका वंश आगे नहीं चला, जिसके बाद शृंगार सेवा को राजभोग सेवा और शयन भोग सेवा में बांट दिया गया. यह परंपरा सालों से चली आ रही है.

क्या बोले हिमांशु गोस्वामी?

इस बारे में हिमांशु गोस्वामी जोकि बांके बिहारी मंदिर की सेवायत हैं, उन्होंने कहा कि ठाकुर बांके बिहारी महाराज हमारे पूर्वज सेवायत हरिदास महाराज की तपस्या का फल हैं. उन्होंने खुद अपनी तपस्या से उन्हें अर्जित किया है. इसलिए उन पर हमारा अधिकार है. हम उन्हें कहीं भी ले जा सकते हैं.

हिमांशु गोस्वामी से जब पूछा गया कि मंदिर या भगवान कभी एक व्यक्ति के नहीं होते, वो तो सार्वजनिक होते हैं. इस पर उन्होंने बताया कि बांके बिहारी मंदिर आने वाले सभी भक्त हमारे शिष्य हैं. जैसे कि अपने घर में कोई लड्डू गोपाल हैं, तो हम चाहेंगे तभी दर्शन कराएंगे. इस प्रकार ठाकुर बांके बिहारी हमारे हैं. हम चाहे तो दर्शन कराएं, हम चाहे तो नहीं कराएं.

यह तो हुई अधिकारों की बात, अब बात आती है कि ठाकुर बांके बिहारी महाराज का क्या स्थानांतरण होना आसान है. इसका जवाब इतिहास में मिलता है. ठाकुर बांके बिहारी महाराज जब प्रकट हुए तो वह निधिवन मंदिर में हुए. इसके बाद ठाकुर बांके बिहारी महाराज का मंदिर है, वहां पर विराजमान हुए. लेकिन इसके बाद फिर वह यहां से भरतपुर चले गए. फिर वहां से ठाकुर बांके बिहारी महाराज को वृंदावन लाया गया. तभी से ठाकुर बांके बिहारी महाराज भक्तों को दर्शन दे रहे हैं, यानी कि पूर्व में भी उनका स्थानांतरण हो चुका है.

गोस्वामी समाज की माने तो वो ठाकुर बांके बिहारी महाराज को अपने साथ ले जा सकते हैं, यह उनका अधिकार कहता है. लेकिन दूसरी ओर इसका कानूनी पहलू भी है, जो यह बताता है कि सार्वजनिक वस्तु, सार्वजनिक रहती है. जिस पर किसी का अधिकार नहीं होता है, अब देखना यह है कि आने वाले समय में क्या होता है.

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