
Rishi Panchami Tradition in Balod: जोगी राव बाबा मंदिर में औषधियों की शुद्धि और सिद्धि, गुरु धनीत्तर की परंपरा निभा रहे साधक
बालोद: जिले के वनांचल क्षेत्र में लोक आस्था और पारंपरिक ज्ञान का एक अनूठा दृश्य मंगलवार को देखने को मिला. मान्यता है कि इस विशेष तिथि पर ब्रह्मांडीय ऊर्जा, ग्रह-नक्षत्र और पंचतत्व अपने चरम प्रभाव में होते हैं. इसी अटूट विश्वास के साथ पारंपरिक औषधि साधक और बैगा-गुनिया जंगलों की खाक छानकर दुर्लभ जड़ी-बूटियां एकत्र करने निकले. औषधियां जुटाने के बाद सभी झलमला स्थित सिद्ध जोगी राव बाबा मंदिर पहुँचे, जहाँ औषधियों की शुद्धि और सिद्धि के लिए विशेष पूजा-अर्चना की गई.
🪵 2. झलमला के जोगी राव बाबा मंदिर में विशेष अनुष्ठान, ऋषि पंचमी पर गुरु धनीत्तर की विद्या पाने पहुंचे अनुयायी
बालोद में ऋषि पंचमी के पावन अवसर पर उनके अनुयायी गुरु धनवंतरी की विद्या प्राप्त करने और अनोखी सिद्धि करने के लिए जंगलों में पहुंचे. औषधि साधक जंगलों से लाई गई विभिन्न वनस्पतियों को लेकर सीधे झलमला स्थित जोगी राव बाबा मंदिर पहुँचे और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की. पुजारियों और साधकों का मानना है कि इस दिन जड़ी-बूटियों को अर्पित करने से उनका औषधीय प्रभाव कई गुना अधिक बढ़ जाता है और तंत्र-विद्या के निवारण से जुड़ी परंपराएं पूरी होती हैं.
🍃 3. छत्तीसगढ़ की लोक-परंपरा में ‘गुरु धनीत्तर’ का अमर स्वरूप, आयुर्वेद और सर्पदंश निवारक के रूप में होती है पूजा
गुरु दुष्यंत सिंह ओटी ने बताया कि छत्तीसगढ़ और मध्य भारत की लोक-परंपरा में ‘गुरु धनीत्तर’ को आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि का ही लोक-अवतार माना जाता है. किंवदंतियों के अनुसार, गुरु धनीत्तर को प्रकृति की हर वनस्पति, पत्ती और जड़ की भाषा का पूर्ण ज्ञान था. तक्षक नाग और विष-हरण से जुड़ी लोक-गाथाओं में उन्हें असाध्य रोगों और सर्पदंश के अचूक ज्ञाता के रूप में पूजा जाता है. पुजारी दीनबंधु ठाकुर ने बताया कि पूर्वजों के समय से ही इस परंपरा को निभाया जा रहा है, जिसमें नाग-नागिन के जोड़ों की विशेष पूजा भी शामिल है.
📚 4. विलुप्त होती वनौषधि विद्या को सहेजने का संकल्प, नई पीढ़ी को सिखाई जा रही है दुर्लभ पौधों की पहचान
मंदिर पहुँचे साधकों ने साझा किया कि यह वार्षिक अनुष्ठान उनके लिए मात्र एक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन गुरुकुल परंपरा के प्रति सच्ची कृतज्ञता है. जंगलों में नई पीढ़ी के शिष्यों को ले जाकर दुर्लभ पौधों की पहचान कराना और उनके आयुर्वेदिक गुणों से अवगत कराना इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य है. गुरु धनीत्तर के इस अमूल्य ज्ञान को सुरक्षित रूप से अगली पीढ़ी तक पहुँचाना ही इस प्राचीन परंपरा की असली पूंजी है.

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