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Hartalika Teej 2026 Katha: 14 सितंबर को रखा जाएगा हरतालिका तीज व्रत, जानें देवी पार्वती की तपस्या की अमर व्रत कथा

धार्मिक संदर्भ: हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का महापर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

इस वर्ष 14 सितंबर, सोमवार के पावन दिन सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सुहाग की दीर्घायु और कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए यह निर्जला व्रत रखेंगी। इस पावन अवसर पर उस अमर व पौराणिक कथा का श्रवण और स्मरण किया जाता है, जब जगतजननी देवी पार्वती ने देवाधिदेव महादेव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अपना संपूर्ण जीवन तप और साधना में समर्पित कर दिया था। बाल्यकाल से ही उनके हृदय में केवल भगवान शिव का वास था। जब उनके पिता ने उनका विवाह अन्यत्र तय करना चाहा, तब देवी ने राजमहल का त्याग कर दिया और सखियों की सहायता से घने वन में जाकर साधना का मार्ग चुना।

🌿 राजसी वैभव का त्याग और जंगल में घोर तप: सूखे पत्तों और वायु के सहारे की साधना

माता पार्वती के त्याग और कठिन साधना का विवरण:

  • सुख-सुविधाओं का परित्याग: भगवान शिव को जीवनसाथी के रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने राजसी वस्त्र, आभूषण और राजमहलों के ऐश्वर्य को एक क्षण में त्याग दिया।

  • अन्न-जल का त्याग: घने और एकांत जंगल में जाकर उन्होंने अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर दिया और निराहार तपस्या आरंभ की।

  • कठिन परीक्षा: साधना के शुरुआती दौर में वे वृक्षों से गिरे सूखे पत्तों का सेवन करती रहीं और बाद में केवल वायु पीकर घोर तप में लीन रहीं।

  • मौसम की मार सहन की: बिना किसी शिकायत के उन्होंने भयंकर शीत, तपती धूप और मूसलाधार बारिश को सहन किया। उनका एकमात्र लक्ष्य केवल आशुतोष भगवान शिव को प्रसन्न करना था।

🪨 बालू का शिवलिंग बनाकर की आराधना: निश्चल भक्ति और अटूट संकल्प

पूजा विधान और सखियों का सहयोग:

  • रेत के शिवलिंग का निर्माण: जंगल के भीतर नदी तट पर देवी पार्वती ने अपने हाथों से बालू (रेत) का पवित्र शिवलिंग निर्मित किया।

  • नित्य नियम से पूजा: वे प्रतिदिन प्रातःकाल से उस पार्थिव बालू शिवलिंग की वैदिक मंत्रों और पंचोपचार विधि से पूजा-अर्चना करती थीं।

  • दृढ़ प्रतिज्ञा: जब उनके पिता उन्हें ढूंढते हुए वन पहुंचे और वापस लौटने का आग्रह किया, तब भी देवी अपने संकल्प से विचलित नहीं हुईं। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि उनका हृदय और जीवन केवल महादेव को समर्पित है।

  • सखियों का हरण (हरतालिका): सखियों द्वारा उनका हरण कर गुप्त वन में ले जाने के कारण ही इस पावन तिथि और व्रत को ‘हरतालिका’ के नाम से जाना गया।

🔱 महादेव का साक्षात प्राकट्य और वरदान: पूर्ण हुई माता पार्वती की मनोकामना

शिव-पार्वती मिलन और व्रत का धार्मिक महत्व:

  • भोलेनाथ हुए प्रसन्न: वर्षों की निष्काम, निश्चल और कठोर साधना को देखकर भगवान शिव आशुतोष रूप में प्रकट हुए और देवी की अटूट निष्ठा से प्रसन्न होकर दर्शन दिए।

  • अर्धांगिनी का वरदान: शिव जी ने देवी पार्वती को अपनी अर्धांगिनी और जगतजननी के रूप में स्वीकार करने का अमर वरदान दिया।

  • तिथि का महात्म्य: जिस पावन तिथि को भगवान शिव ने यह वरदान प्रदान किया, वह भाद्रपद शुक्ल तृतीया ही थी।

  • अखंड सुहाग का आशीर्वाद: ऐसी मान्यता है कि जो भी महिला इस दिन नियमपूर्वक बालू के शिवलिंग का पूजन और व्रत कथा का श्रवण करती है, उसे अखंड सौभाग्य और दांपत्य सुख का वरदान प्राप्त होता है।

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