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48 जिलों में फर्जी हाजिरी का फंडा — बैतूल के 5 डॉक्टर्स के भी सार्थक ऐप घोटाले में शामिल होने का आरोप

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बैतूल। सरकार की पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश अब फर्जीवाड़े के जाल में फंस गई है। मध्यप्रदेश सरकार के “सार्थक ऐप” पर बिना ड्यूटी आए फर्जी हाजिरी लगाने का मामला अब प्रदेशभर में फैल गया है।
स्वास्थ्य संचालनालय की जांच में यह खुलासा हुआ है कि रायसेन, राजगढ़, हरदा, सीहोर, अलीराजपुर, दमोह, सिंगरौली, सतना, रीवा, सीधी, बड़वानी, सागर, निवाड़ी और बैतूल समेत 48 जिलों में 170 बॉन्डेड डॉक्टरों ने ऐप पर फर्जी उपस्थिति दर्ज कराई।
बैतूल में पांच डॉक्टर फर्जी हाजरी लगाते मिले
बैतूल जिले में पांच डॉक्टरों द्वारा डेढ़-दो सौ किलोमीटर दूर से ही ऐप पर हाजिरी लगाने का खुलासा हुआ है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. मनोज कुमार हुरमाडे ने बताया कि जांच में
डॉ. राहुल सिंह गहलोत, डॉ. संस्कृति साहू, डॉ. सरस्वती कंगाले, सूरज सोलंकी और वैशाली भूमरकर के नाम सामने आए हैं।
इन सभी ने कैमरा ट्रिक और फोटो एडिटिंग का सहारा लेकर यह दिखाया कि वे अस्पताल में मौजूद हैं, जबकि वे वास्तव में अपने घर या किसी अन्य जिले में बैठे थे।
जांच में GPS लोकेशन उनके ड्यूटी स्थल से 150–200 किमी दूर पाई गई है।
जांच कमेटी गठित, सात दिन में रिपोर्ट
CMHO कार्यालय ने इस पूरे प्रकरण की जांच के लिए जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO) और वरिष्ठ चिकित्सकों की तीन सदस्यीय कमेटी गठित की है।
यह समिति सात दिन में विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी।
CMHO डॉ. हुरमाडे ने कहा —
> “ऐप पर फर्जी हाजिरी गंभीर अनुशासनहीनता है। जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
कैसे काम करता है ‘सार्थक ऐप’
“सार्थक ऐप” मध्यप्रदेश सरकार द्वारा दो माह पहले शुरू किया गया डिजिटल उपस्थिति प्लेटफॉर्म है।
इसमें हर कर्मचारी को सुबह 9 से 11:30 बजे के बीच रेटिना स्कैन और GPS लोकेशन से हाजिरी दर्ज करनी होती है।
इसके बाद पांच घंटे बाद फिर से उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती है, ताकि यह साबित हो कि कर्मचारी वाकई कार्यस्थल पर मौजूद था।
ऐसा न होने पर उस दिन की आधा दिन ड्यूटी मानी जाती है या वेतन काटा जा सकता है।
कर्मचारियों की दलील — “नेटवर्क की दिक्कत, सिस्टम अव्यवहारिक”
कई कर्मचारी इस सिस्टम को अव्यवहारिक बताते हुए कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क की समस्या के कारण ऐप पर हाजिरी दर्ज करने में कठिनाई होती है।
हालांकि, स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि तकनीकी सीमाएं फर्जीवाड़े का बहाना नहीं बन सकतीं।
डिजिटल पारदर्शिता पर बड़ा सवाल
प्रदेश में डिजिटल मॉनिटरिंग के लिए तैयार किया गया यह सिस्टम अब विश्वसनीयता के संकट में है।
जब डॉक्टर ही रेटिना स्कैन और GPS लोकेशन जैसी सुरक्षा प्रणाली को चकमा देकर घर बैठे हाजिरी लगा सकते हैं, तो सवाल यह उठता है कि क्या तकनीक से पारदर्शिता सच में संभव है या यह नया रास्ता बन गई है भ्रष्टाचार के लिए?
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