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सुपौल के बसबिट्टी कुंवर टोला की अनोखी जन्माष्टमी: विसर्जन के दिन नहीं जलता चूल्हा, चूड़ा-दही पर रहते हैं ग्रामीण

सुपौल (बिहार): बिहार के सुपौल जिले का बसबिट्टी कुंवर टोला अपनी एक सदी पुरानी और अत्यंत विशिष्ट धार्मिक परंपरा के लिए पूरे क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।

इस गांव में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के साथ-साथ शक्ति स्वरूपा मां भगवती की प्रतिमा भी विधिवत स्थापित कर पूजी जाती है। इस पर्व का सबसे अनूठा नियम प्रतिमा विसर्जन के दिन देखने को मिलता है, जब पूरे गांव के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। ग्रामीण इस दिन केवल चूड़ा-दही और फलाहार ग्रहण कर करीब 100 वर्षों से चली आ रही इस पारंपरिक मर्यादा का पालन करते हैं।

📜 करीब 100 साल पुरानी है गौरवशाली परंपरा: पीढ़ी-दर-पीढ़ी आस्था का अनवरत प्रवाह

धार्मिक पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक महत्व:

  • भौगोलिक स्थिति: यह पावन स्थल सुपौल जिला मुख्यालय से लगभग छह किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित है, जहां हर वर्ष जन्माष्टमी का उत्सव अत्यंत श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाता है।

  • शताब्दी वर्ष का इतिहास: स्थानीय बुजुर्गों और ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा पिछले करीब 100 वर्षों से अनवरत रूप से चली आ रही है।

  • वैष्णव और शाक्त मत का संगम: सामान्यतः जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव तक सीमित होती है, लेकिन बसबिट्टी कुंवर टोला में भगवान श्रीकृष्ण, राधारानी और मां भगवती की संयुक्त आराधना वैष्णव और शाक्त परंपरा का अनूठा समन्वय प्रस्तुत करती है।

⏳ प्रतिमा स्थापना के लिए करना पड़ता है वर्षों इंतजार: इस वर्ष पटना के ठेकेदार विजय सिंह बने मूर्ति दाता

मूर्ति निर्माण और सौभाग्य की परंपरा:

  • प्रतीक्षा सूची: पूजा समिति के अध्यक्ष शुभंकर कुंवर के अनुसार, गांव में प्रतिमा निर्माण और उसकी स्थापना का सेवा-भार प्राप्त करना अत्यंत पुण्य और सौभाग्य का कार्य माना जाता है। इस अवसर को पाने के लिए ग्रामीणों को कई-कई वर्षों तक अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।

  • इस वर्ष के यजमान: वर्ष 2026 के इस पावन महोत्सव में प्रतिमा निर्माण व स्थापना का पावन दायित्व बसबिट्टी निवासी विजय सिंह ने संभाला है, जो वर्तमान में पटना में निर्माण ठेकेदारी से जुड़े हैं।

  • धार्मिक मान्यता: ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि जो भी व्यक्ति प्रतिमा निर्माण का संकल्प लेता है, उस पर भगवान श्रीकृष्ण और मां भगवती की असीम कृपा बरसती है।

🚫 विसर्जन के दिन चूल्हा न जलाने का कड़ा नियम: फलाहार पर रहते हैं पूरे गांव के लोग

अनोखी परंपरा का व्यावहारिक स्वरूप:

  • रसोई में नहीं बनता भोजन: सदियों पुरानी मान्यता और गांव के सामूहिक संकल्प के तहत प्रतिमा विसर्जन के दिन गांव के किसी भी चूल्हे में अग्नि प्रज्वलित नहीं की जाती और न ही कोई पका हुआ भोजन तैयार होता है।

  • सात्विक फलाहार: बच्चे, बुजुर्ग और युवा—सभी ग्रामीण इस दिन पारंपरिक रूप से चूड़ा-दही, ताजे फल और अन्य सात्विक फलाहार ग्रहण करते हैं।

  • सामूहिक अनुशासन: पूरा गांव अत्यंत श्रद्धा, शांति और कड़े अनुशासन के साथ इस नियम का पालन करते हुए विसर्जन की तैयारियों में जुटता है।

🥁 ढोल-नगाड़ों और जयकारों के साथ निकलती है विसर्जन यात्रा: जुटते हैं हजारों श्रद्धालु

विसर्जन उत्सव और भक्तिमय वातावरण:

  • हजारों की भीड़: प्रतिमा विसर्जन के अवसर पर बसबिट्टी सहित आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों की संख्या में महिला, पुरुष और बच्चे एकत्रित होते हैं।

  • भक्तिमय माहौल: पारंपरिक ढोल-नगाड़ों, ताशों और भगवान के गगनभेदी जयकारों के बीच विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है, जिससे समूचा क्षेत्र आध्यात्मिक रंग में रंग जाता है।

  • सामाजिक समरसता: यह आयोजन विभिन्न समुदायों और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं को एकता के सूत्र में बांधता है।

👥 पूजा समिति संभाल रही संपूर्ण व्यवस्था: नई पीढ़ी तक पहुंच रही सांस्कृतिक विरासत

आयोजन समिति और सांस्कृतिक धरोहर:

  • समिति के पदाधिकारी: इस वर्ष जन्माष्टमी महोत्सव की विधि-व्यवस्था का संपूर्ण संचालन पूजा समिति के अध्यक्ष शुभंकर कुंवर, सचिव पंकज कुंवर और कोषाध्यक्ष अरुण कुंवर के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हो रहा है।

  • धरोहर का संरक्षण: बसबिट्टी कुंवर टोला की यह जन्माष्टमी आस्था, सामाजिक एकता और अनुशासन का अप्रतिम उदाहरण है, जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहकर नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध धार्मिक विरासत से परिचित करा रही है।

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