
IIT में अच्छी रैंक के बाद भी चुना शतरंज: सड़कों पर गुजारी रातें, अब 30 देशों में सिखा रहे हैं चेस; पढ़ें चंद्रजीत की संघर्ष गाथा
उदयपुर (राजस्थान): “ये बच्चों का खेल नहीं, तुम समझ नहीं पाओगे”—पिता के मुंह से निकले इन चंद कड़वे शब्दों ने उदयपुर के चंद्रजीत सिंह राजावत के भीतर ऐसा जुनून पैदा किया कि उन्होंने राजस्थान के पहले ‘एरिना ग्रैंडमास्टर’ (Arena Grandmaster – AGM) बनकर ही दम लिया।
यह किस्सा उनके आईआईटी (IIT) की तैयारी के दिनों का है, जब उन्हें निंटेंडो के मारियो गेम के साथ शतरंज जैसा एक खेल दिखा। उनके पिता की उस खेल में पहले से काफी रुचि थी। जब उन्होंने पिता को खेलते देखा, तो खुद भी खेलने की इच्छा जताई। लेकिन पिता ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि वे इसे नहीं समझ पाएंगे। इस एक बात ने युवा चंद्रजीत की जिंदगी की दिशा पूरी तरह बदल दी।
🏆 खुद सीखी चालें और अगले ही दिन पिता को हराया, सफलता के पीछे छिपा कड़ा संघर्ष
चंद्रजीत ने चुनौती को स्वीकार करते हुए शतरंज की बारीकियों को खुद समझना शुरू किया:
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पहले ही दिन जीत: खेल के नियम खुद सीखने के अगले ही दिन उन्होंने अपने पिता को शतरंज की बाजी में हरा दिया।
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वैश्विक स्तर पर पहचान: आज चंद्रजीत न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के छात्रों को शतरंज सिखाते हैं और पेशेवर ट्रेनर्स (प्रशिक्षकों) को भी प्रशिक्षित करते हैं।
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गहरा संघर्ष: उनकी इस शानदार उपलब्धि के पीछे वर्षों का कठिन संघर्ष छिपा हुआ है, जिसकी गहराई उनकी जन्मभूमि उदयपुर की झीलों जैसी है।
🏏 क्रिकेट से था शुरुआती लगाव, माता-पिता की डांट के बीच भी जारी रहा शतरंज का सफर
शतरंज में अंतरराष्ट्रीय मुकाम हासिल करने से पहले चंद्रजीत क्रिकेट के प्रति समर्पित थे:
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क्रिकेट से किनारा: चयन प्रक्रिया की जटिलताओं और कड़े मुकाबले को देखते हुए उन्होंने क्रिकेट छोड़ दिया और पढ़ाई में मन लगाते हुए आईआईटी की तैयारी शुरू की।
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शतरंज से जुड़ाव: वर्ष 2011-12 के दौरान, करीब 16 वर्ष की आयु में उनका शतरंज से गहरा लगाव हुआ। जल्द ही स्थानीय स्तर पर उनके खेल की चर्चा होने लगी।
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परिवार की चिंता: माता-पिता को भय था कि शतरंज के चक्कर में कहीं उनका बेटा आईआईटी का भविष्य न खो दे। मना किए जाने के बावजूद चंद्रजीत छुप-छुपकर टूर्नामेंट्स खेलते रहे। जब अखबारों में उनकी जीत की खबरें छपतीं, तो परिवार से डांट भी पड़ती थी।
🚪 IIT की अच्छी रैंक के बाद भी नहीं ली काउंसलिंग, घर छोड़कर दिल्ली का रुख
चंद्रजीत ने अपने सपनों को पूरा करने के लिए कड़ा और साहसिक कदम उठाया:
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आईआईटी छोड़ना: उन्होंने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा दी और बेहतरीन रैंक हासिल की, लेकिन काउंसलिंग फॉर्म भरने से साफ इनकार कर दिया।
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पारिवारिक तनाव: मध्यमवर्गीय परिवार और पिता के अस्थिर व्यवसाय के बीच उनके इस फैसले से घर में भारी विवाद होने लगा।
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घर का त्याग: लगातार होने वाली बहसों और दबाव से तंग आकर चंद्रजीत ने घर छोड़ दिया और अपने दम पर पहचान बनाने दिल्ली चले आए।
🌌 दिल्ली में सड़क बनी बिस्तर, जेब में नहीं थे पैसे पर हौसले रहे बुलंद
घर छोड़कर दिल्ली आने के बाद शुरुआती दौर बेहद दर्दनाक और संघर्षपूर्ण रहा:
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आर्थिक तंगी: साल 2014 में उन्होंने दिल्ली में ₹3,500 की एंट्री वाले एक टूर्नामेंट में हिस्सा लिया, जहां साझा आवास मिला था। उनके पास भरपेट भोजन करने तक के पैसे नहीं होते थे।
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फुटपाथ पर रातें: रहने की समुचित व्यवस्था न होने के कारण उन्हें कई रातें खुले आसमान के नीचे सड़क पर सोकर गुजारनी पड़ीं।
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सकारात्मक सोच: इन तमाम भीषण कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने कभी वापस लौटने का विचार नहीं किया, क्योंकि शतरंज के प्रति उनका जुनून हर दर्द पर भारी था।
👑 राजस्थान के पहले AGM बनने का गौरव, अब 30 देशों में फैला ‘किंगडम ऑफ चेस’ का परचम
कड़े संघर्ष और लगातार मेहनत ने चंद्रजीत को शीर्ष मुकाम पर पहुंचाया:
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बड़े खिलाड़ियों को मात: दिल्ली में एक अनुभवी खिलाड़ी को हराने के बाद उनका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया। इसके बाद उन्होंने एजीएम (AGM) का खिताब जीतकर इतिहास रचा और राजस्थान के पहले एरिना ग्रैंडमास्टर बने। इस दौरान उन्होंने कई ग्रैंडमास्टर्स का सामना किया और डी. गुकेश, आर. प्रज्ञानानंद व निहाल सरीन जैसे दिग्गज युवा खिलाड़ियों से मुकाबला किया।
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किंगडम ऑफ चेस एकेडमी: 2019 में उदयपुर लौटकर उन्होंने ‘किंगडम ऑफ चेस एकेडमी’ की स्थापना की।
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अंतरराष्ट्रीय पदक: उनके द्वारा प्रशिक्षित 100 से अधिक विद्यार्थियों ने स्टेट, नेशनल, कॉमनवेल्थ, एशियन गोल्ड और वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। आज उनकी एकेडमी विश्व के 30 से अधिक देशों में अपनी सेवाएं दे रही है।

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