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इलेक्ट्रिक कारों से चमकेगा भारत, 5 साल में जापान-कोरिया को भी छोड़ेगा पीछे, तैयार है ये बड़ा प्लान!

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मारुति सुजुकी ने अपनी पहली इलेक्ट्रिक SUV e-Vitara तैयार कर ली है. मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में बने मारुति के प्लांट से इस गाड़ी को हरी झंडी दिखाई. माना जा रहा है कि कंपनी इसे सितंबर में भारत में लॉन्च कर सकती है, हालांकि फिलहाल ये गाड़ी विदेशों में एक्सपोर्ट की जाएगी. e-Vitara खास इसलिए भी है क्योंकि ये मारुति की पहली पूरी तरह से इलेक्ट्रिक कार है. अभी तक भारत के ईवी मार्केट में टाटा और महिंद्रा जैसी कंपनियों का दबदबा रहा है, लेकिन अब मारुति भी मैदान में उतर आई है.

Rhodium Group नाम की न्यूयॉर्क बेस्ड एक रिसर्च फर्म की रिपोर्ट बताती है कि भारत की इलेक्ट्रिक कार बनाने की क्षमता 2030 तक 25 लाख यूनिट (2.5 मिलियन) सालाना हो सकती है. ये मौजूदा क्षमता (2 लाख यूनिट) से 10 गुना ज्यादा है. अगर ऐसा हुआ, तो भारत चीन, यूरोप और अमेरिका के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा ईवी निर्माता बन सकता है. लेकिन रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि भारत को इंटरनेशनल मार्केट में टिकना है, तो उसे प्रोडक्शन की लागत को कम करना होगा, ताकि वह चीन जैसी बड़ी ताकतों से मुकाबला कर सके.

मांग से ज्यादा होगी ईवी गाड़ियों की प्रोडक्शन क्षमता

Rhodium की रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत में इलेक्ट्रिक कारों की मांग लगभग 4 लाख से 14 लाख के बीच होगी, लेकिन उत्पादन क्षमता 25 लाख तक पहुंच सकती है. यानी भारत में जितनी गाड़ियों की जरूरत होगी, उससे कहीं ज्यादा गाड़ियां बनाई जाएंगी. इसका मतलब ये है कि यहां बनने वाली बड़ी संख्या में ईवी गाड़ियां देश के बाहर, यानी एक्सपोर्ट के लिए तैयार होंगी. लेकिन ऐसा तभी मुमकिन है जब हमारी कंपनियां अपनी लागत को कम करें ताकि वे चीन जैसे बड़े खिलाड़ियों से मुकाबला कर सकें और अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिक सकें.

सरकार का मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड वाला प्लान अब इलेक्ट्रिक गाड़ियों के मामले में भी जोर पकड़ रहा है. टाटा मोटर्स, एमजी मोटर, महिंद्रा जैसी बड़ी कंपनियां मिलकर देश के ईवी मार्केट का लगभग 90% हिस्सा अपने पास रखती हैं. लेकिन सिर्फ गाड़ियां बनाना ही काफी नहीं है. अगर भारत को दुनिया के बाजार में अपनी जगह बनानी है, तो कीमत और लागत के मामले में भी मजबूत रहना होगा. चीन पहले से ही बहुत सस्ती और बड़ी संख्या में इलेक्ट्रिक कारें बना रहा है, जो उसे एक बढ़त देता है. इसलिए हमारे यहां की कंपनियों को तकनीक सुधारनी होगी, बड़े पैमाने पर उत्पादन करना होगा और लागत कम करने के नए-नए तरीके अपनाने होंगे. तभी वे अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में टिक पाएंगी.

भारत बनेगा टॉप-4 ईवी निर्माता

2030 तक भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की उत्पादन क्षमता 25 लाख तक पहुंच सकती है, जिससे वह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा ईवी निर्माता बन जाएगा. इस दौरान भारत जापान और दक्षिण कोरिया को भी पीछे छोड़ देगा. अभी जापान की क्षमता लगभग 11 लाख यूनिट्स की है और दक्षिण कोरिया की करीब 5 लाख यूनिट्स की, लेकिन दोनों देशों में आगे की योजनाएं धीरे-धीरे ही बन रही हैं.

वहीं भारत में चीजें काफी तेजी से बदल रही हैं. अभी यहां 2 लाख गाड़ियों का उत्पादन हो रहा है, और 3 लाख की क्षमता बनी हुई है जो शुरू होने वाली है. इसके अलावा, 13 लाख यूनिट्स के लिए कारखाने बन रहे हैं और 7 लाख यूनिट्स की नई योजनाएं भी सरकार और कंपनियों ने घोषित की हैं. यह सब बताता है कि भारत का इलेक्ट्रिक वाहनों का सेक्टर बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारत दुनिया के बड़े ईवी निर्माताओं में से एक बनकर कई दूसरे देशों को पीछे छोड़ सकता है.

मेड इन इंडिया’ पर जोर से मिला ईवी सेक्टर को बढ़ावा

भारत ने इलेक्ट्रिक गाड़ियों को बढ़ावा देने के लिए एक अलग और मजबूत रास्ता चुना है. सरकार ने गाड़ियों के निर्माण से लेकर उनकी बिक्री तक हर कदम पर सक्रिय भूमिका निभाई है. इसके लिए ग्राहकों को सब्सिडी दी गई ताकि वे ईवी खरीद सकें और ये सस्ता पड़े. साथ ही, गाड़ियों का निर्माण भारत में ही करने की शर्त रखी गई है. बैटरी और अन्य पार्ट्स बनाने वालों को भी खास प्रोत्साहन दिए गए हैं ताकि वे यहां उत्पादन बढ़ाएं. चार्जिंग स्टेशन और जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है. इसके अलावा, सरकार ने पूरी बनी हुई विदेशी इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर भारी आयात शुल्क लगा दिया है, जो 70% से लेकर 100% तक है. इससे विदेशी कंपनियों के लिए भारत में सीधे गाड़ियां बेच पाना महंगा और मुश्किल हो गया है. इसका असर यह हुआ कि अब भारत में बनने वाली लगभग सारी इलेक्ट्रिक गाड़ियां देश की अपनी कंपनियों द्वारा ही बनाई जा रही हैं.

बैटरी मैन्युफैक्चरिंग में भारत की रफ्तार तेज़

बैटरी के मामले में भी भारत ने तेज़ी से तरक्की की है. रिपोर्ट बताती है कि अब भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जहां बैटरी सेल और मॉड्यूल दोनों का निर्माण बढ़ रहा है. अनुमान है कि 2030 तक भारत की बैटरी सेल बनाने की क्षमता 567 गीगावॉट ऑवर (GWh) तक पहुंच सकती है. ये आंकड़ा चीन (4,818 GWh), अमेरिका (1,169 GWh) और यूरोप (997 GWh) के बाद दुनिया में चौथे नंबर पर होगा, और कोरिया, जापान और मलेशिया जैसे देशों से आगे. हालांकि, Rhodium की रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि भारत की यह तेज़ ग्रोथ अभी ज्यादातर निर्माणाधीन या सिर्फ घोषित प्रोजेक्ट्स पर टिकी है. यानी अगर ये प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं हुए, तो जोखिम बना रहेगा.

ईवी बिक्री में भारत की रफ्तार धीमी

दूसरी तरफ, ईवी खरीदने के मामले में भारत थोड़ा पीछे है. उदाहरण के लिए, वियतनाम में 2022 में जहां सिर्फ 3% लोग ईवी खरीदते थे, वहीं 2024 तक ये आंकड़ा 17% तक पहुंच गया. जबकि भारत में 2024 तक इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री सिर्फ 2% ही रही, जो काफी कम है. इसका मतलब ये है कि भारत में ईवी का बाजार तो बड़ा है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए कुछ जरूरी बातें पूरी करनी होंगी. सबसे पहले, सरकार की नीतियां साफ़ और लगातार होनी चाहिए ताकि लोग भरोसा कर सकें. साथ ही, गाड़ियों की कीमतें और बनावट का खर्च कम होना चाहिए, जिससे लोग आसानी से खरीद सकें. सबसे जरूरी बात ये है कि जो लोग ईवी खरीदें, उनका अनुभव अच्छा हो, यानी गाड़ी चलाने से लेकर चार्जिंग तक सब कुछ आसान और आरामदायक होना चाहिए. तभी भारत की ईवी इंडस्ट्री सच में आगे बढ़ पाएगी.

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