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सिविल जज बनने के बाद भी नहीं डिगा वैराग्य का संकल्प, प्रखरश्री ने चुना मोक्ष का मार्ग

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मोहम्मद अमन की रिपोर्ट

बैतूल। जिस बेटी को माता-पिता ने बड़े लाड़-प्यार से पाला, ऊंची शिक्षा दिलाई और जिसके सिविल जज बनने पर परिवार को गर्व था, आज उसी बेटी को घर से विदा करते समय मां की आंखें बार-बार भर आईं। पिता भी भारी मन से उसका चेहरा निहारते रहे। घर मेहमानों से भरा था, लेकिन इस विदाई में न शादी की शहनाई थी और न किसी नए सांसारिक रिश्ते की शुरुआत। यह विदाई थी सांसारिक जीवन से वैराग्य की ओर बढ़ने की। गोल्ड मेडलिस्ट और सिविल जज के पद पर चयनित ब्रह्मचारिणी प्रखरश्री दीदी ने जैनेश्वरी दीक्षा का संकल्प लेकर मोक्ष मार्ग चुन लिया है। रविवार को बैतूल में उनके साथ चार अन्य दीक्षार्थी बहनों की भव्य बिनौली यात्रा निकाली गई। इनमें एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) भी शामिल हैं।

प्रखरश्री दीदी के चेहरे पर इस विदाई के दौरान संतोष और प्रसन्नता नजर आ रही थी। दूसरी ओर मां-बाप के मन में गर्व के साथ बेटी की कठिन साधना को लेकर चिंता भी थी। जिस बेटी के भविष्य को लेकर उन्होंने बड़े सपने देखे थे, वह अब उन सभी सांसारिक उपलब्धियों को पीछे छोड़कर संयम और साधना के रास्ते पर आगे बढ़ने जा रही है।

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‘बचपन से ही तय था, इस मार्ग पर आगे बढ़ना है’

प्रखरश्री दीदी कहती हैं कि बचपन से ही उनके मन में इस मार्ग पर आगे बढ़ने का भाव था। शादी नहीं करने और संयम का जीवन अपनाने का विचार भी पहले से था। माता-पिता के धार्मिक संस्कार, जिनवाणी का अध्ययन और गुरुजनों का सानिध्य मिलने से वैराग्य के भाव लगातार मजबूत होते गए।

वे बताती हैं कि आचार्य विद्यासागर महाराज से उन्हें आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत मिला था। इस व्रत का पालन करने से जीवन में विशुद्धि बढ़ती गई। गुरु मां के दर्शन और सानिध्य ने उन्हें इस मार्ग पर आगे बढ़ने की दिशा दी।

जब उनसे पूछा गया कि लाड़-प्यार में पली-बढ़ी होने के बावजूद इतना कठिन रास्ता क्यों चुना, तो उनका जवाब था- ‘यह रास्ता कठिन नहीं, बल्कि सबसे सरल है। हमें दूर से यह कठिन लगता है, लेकिन जब इस मार्ग पर आगे बढ़ जाते हैं तो सब सरल होता जाता है।’

सिविल जज की परीक्षा में चयन के अनुभव को लेकर प्रखरश्री कहती हैं कि वहां पहुंचकर उन्हें एहसास हुआ कि सबसे बड़ा पद कोई सांसारिक पद नहीं, बल्कि आर्यिका व्रत धारण करना है। बाकी सभी पद अस्थायी हैं।

मां बोलीं- गर्व भी है और चिंता भी, बेटी इस कठिन पथ को निभा पाएगी?

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बेटी के फैसले को लेकर मां के मन में कई भाव एक साथ हैं। वे कहती हैं कि बेटी मां के सबसे करीब होती है। जब प्रखर ने वैराग्य का मार्ग चुनने का निर्णय बताया तो उन्हें झटका लगा, क्योंकि यह बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण रास्ता है। मन में बार-बार यह सवाल आता था कि बेटी इस मार्ग को निभा पाएगी या नहीं।

मां कहती हैं, ‘एक मन गौरवान्वित होता है कि ऐसा दुर्लभ अवसर हमारे परिवार को मिला। दूसरा मन चिंता करता है कि वह इस कठिन रास्ते को कैसे निभाएगी। दोनों भाव एक साथ चलते हैं।’

वे आगे कहती हैं कि बेटी ने गुरु माता के सानिध्य में रहते हुए परिवार से दूर रहकर अपनी पहली परीक्षा पार कर ली है। अब आगे भी वह इस पथ पर सफलतापूर्वक चल पाए, यही कामना है। शादी के बाद बेटी को विदा करना और इस मार्ग पर विदा करना अलग अनुभव है। इस मार्ग की कठिनाइयों का पता है, लेकिन इसका भविष्य उज्ज्वल है। बेटी जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्त होकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ेगी। उन्होंने कभी बेटी को इस मार्ग पर जाने से मना नहीं किया।

पिता बोले- 2020 में ही बेटी ने तय कर लिया था साध्वी बनना है

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प्रखरश्री के पिता जेके जैन बताते हैं कि घर का माहौल शुरू से धार्मिक रहा। बेटी बचपन से ही इससे प्रभावित थी। भोपाल के संस्कार वैली स्कूल में शिक्षा के बाद उन्होंने क्लैट क्वालिफाई किया और अहमदाबाद से एलएलबी की पढ़ाई की। इसके बाद एलएलएम की शिक्षा और लंदन से कोर्स भी किया। अहमदाबाद में पढ़ाई के दौरान ही उनका जीवन अधिक सात्विक होता गया। वे दिगंबर साधुओं के दर्शन के लिए जाती थीं और शाकाहार सहित कई नियमों का पालन करने लगी थीं।

पिता के मुताबिक, वर्ष 2016 में बेटी ने आचार्य विद्यासागर महाराज के दर्शन के दौरान उनसे कोई नियम देने का आग्रह किया था। इसके बाद शिक्षा पूरी होने तक ब्रह्मचर्य का पालन किया। वर्ष 2020 में आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने की इच्छा जताई। आचार्यश्री ने माता-पिता से सहमति मांगी तो उन्होंने कहा कि आप जो आदेश देंगे, हमें स्वीकार है। इसी दौरान बेटी ने साध्वी बनने की इच्छा भी जाहिर कर दी थी। पिता बताते हैं कि उसी दिन उसने अपना जीवन संयम के मार्ग पर समर्पित करने का निर्णय ले लिया था।

वर्ष 2023 में सिविल जज की परीक्षा के दौरान वे बेटी के साथ रायपुर और डोंगरगढ़ गए थे। वहां आचार्यश्री से मार्गदर्शन मांगा। पिता के अनुसार, आचार्यश्री ने बेटी के चयन को लेकर संकेत देते हुए गुरु मां को उसके भीतर चल रही साधना के बारे में बताया था।

अब बदल जाएंगे रिश्तों के संबोधन

पिता जेके जैन कहते हैं कि आज के समय में जब बच्चों के भविष्य और संस्कारों को लेकर चिंता रहती है, ऐसे में बेटी का यह निर्णय उनके लिए गर्व का विषय है। लेकिन अब जीवन भी पूरी तरह बदल जाएगा। दीक्षा के बाद वह घर-परिवार के सामान्य रिश्तों से ऊपर उठकर साधना के मार्ग पर चलेगी।

वे भावुक होकर कहते हैं, ‘आज के बाद वह घर का त्याग कर देगी। अब वह हमारी बेटी नहीं, बल्कि मां के संबोधन से पूजनीय होगी। हमारे रिश्तों के संबोधन बदल जाएंगे। वह हमें भक्त की दृष्टि से देखेगी और हम उसे श्रद्धा की दृष्टि से देखेंगे।’

दीक्षा के बाद प्रखरश्री का जीवन कठोर नियमों और तपस्या से बंधा होगा। भोजन, पानी और वस्त्र तक सीमित रहेंगे। यही तप और साधना उनके आत्मकल्याण का आधार होंगे।

22 नवंबर को सोनागिरि में होगी जैनेश्वरी दीक्षा

प्रखरश्री दीदी सहित पांचों दीक्षार्थी बहनों का मुख्य जैनेश्वरी दीक्षा समारोह 24 नवंबर 2026 को प्रसिद्ध जैन सिद्ध क्षेत्र सोनागिरि में आयोजित होगा। समारोह जगतपूज्य गणाचार्य भगवान श्री विराग सागर जी महाराज और परम पूज्य धर्मशिरोमणि संयम सूर्य पदाचार्य श्री पदमसागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद तथा परम पूज्य रत्नाकर चंद्रिका गणिनी आर्यिका विशाश्री माताजी की छत्रछाया में संपन्न होगा।

बैतूल के विनोबा नगर स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान गणाचार्य श्री विराग सागर जी की शिष्या आर्यिका 105 विरम्या श्री एवं विसंयोजना श्री माताजी से पांचों दीक्षार्थी बहनें मंगल आशीर्वाद प्राप्त कर संयम और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ रही हैं।

एक ओर सिविल जज बनने की उपलब्धि और दूसरी ओर उस पद से भी ऊपर आध्यात्मिक लक्ष्य को मानकर सब कुछ त्यागने का निर्णय। प्रखरश्री की यह जीवन यात्रा केवल एक परिवार की विदाई नहीं, बल्कि वैराग्य के प्रति उनके दृढ़ संकल्प की कहानी बन गई है।

प्रखरश्री की शैक्षणिक यात्रा

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स्कूली शिक्षा: भोपाल के संस्कार वैली स्कूल में पढ़ाई।

प्रवेश परीक्षा: कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (CLAT) क्वालिफाई किया।

एलएलबी: अहमदाबाद से कानून की पढ़ाई पूरी की।

एलएलएम: कानून में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की।

अंतरराष्ट्रीय शिक्षा: लंदन से भी कोर्स किया।

विशेष उपलब्धि: बीए, एलएलबी और एलएलएम की शिक्षा के दौरान गोल्ड मेडलिस्ट रहीं।

न्यायिक सेवा: सिविल जज की परीक्षा में चयनित हुईं।

कब क्या हुआ जानिए 

2016: आचार्य विद्यासागर महाराज से पहली बार ब्रह्मचर्य का नियम लिया।

2020: आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया और साध्वी बनने का निर्णय किया।

2023: सिविल जज परीक्षा के दौरान भी गुरु का मार्गदर्शन लिया।

2026: घर से विदाई, बिनौली और 22 नवंबर को जैनेश्वरी दीक्षा।

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