Logo
ब्रेकिंग
फोन नहीं उठाते सीईओ,मीडियाकर्मियों में नाराजगी,ज्ञापन सौंपा Ola Uber Ban Chandigarh: ओला-उबर के लाइसेंस रद्द होने के बाद शुरू हुई 'भारत टैक्सी', जानिए यात्रियों... Haryana News: लगातार चौथी बार देश में अव्वल रही करनाल शुगर मिल, केंद्रीय मंत्रियों ने दी प्रतिष्ठित ... NCC DG Team Selection: हरियाणा के होनहार शूटर विजयन्त ढाण्डा ने बढ़ाया राज्य का मान, देश के टॉप-12 शू... Haryana Road Mishap: नूंह सड़क हादसे में चार लोगों की मौत, पत्नी गंभीर रूप से घायल; पुलिस जांच में ज... Haryana Crime News: पानीपत में اغवा हुआ बच्चा बरामद, एक लाख में बेचने की थी डील; पुलिस ने दो को दबोच... Gurnam Singh Chaduni Mahapanchayat: धान खरीद की मांग पर अड़े किसान, हाईवे पर बीती रात; आज होगी बड़ी ... Patna Mithila Colony Incident: दानापुर में खूनी संघर्ष, शादी से पहले सिपाही भाई ने की आत्महत्या, पुल... Delhi Demolition News: शालीमार बाग मैक्स अस्पताल रोड पर देर रात चला पीला पंजा; भारी पुलिस बल तैनात, ... Monsoon Update 2026: मॉनसून की विदाई के बीच बिगड़ेगा मौसम; मध्य प्रदेश, ओडिशा और पूर्वोत्तर में भारी...
Header Ad

‘मुस्लिम पड़ोसियों ने जान बचाई’… रामजीदास का परिवार, जिसने झेला 1947 के विभाजन का दंश

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन इसके साथ आई विभाजन की त्रासदी ने करोड़ों लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी. पंजाब, लाहौर और अमृतसर के गांव-शहरों में हिंसा, लूटपाट और पलायन का मंजर ऐसा था कि लोग आज भी भूल नहीं पाए हैं. इन्हीं में से एक रामजीदास का परिवार भी था, जो कि पाकिस्तान के लाहौर शहर से बचकर बीकानेर में आकर बस गए. आज भी उनका परिवार यहीं हंसी-खुशी रह रहा है.

रामजीदास का जन्म 1935 में पाकिस्तान के लाहौर शहर के निका सुल्ताना इलाके में हुआ था. आजादी के दौरान वह लाहौर के ही एक हिंदू स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे. हालांकि, पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वह बटवारे के समय अपने परिवार के साथ भारत आ गए. रामजीदास की बहू बताती है कि उनके पिता चार भाई-बहनों में सबसे बड़े थे. रामजीदास बताते हैं कि बटवारे के समय चारों तरफ खून खराबा था. लोगों को मारा जा रहा था.

‘मुश्किल से गुजरा समय…’

इस बीच उनका परिवार जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर स्टेशन पहुंचा, जहां से उन्होंने भारत के लिए ट्रेन पकड़ी. इस ट्रेन में मौजूद सभी को लोगों का मारा जा रहा था और लूटपाट की जा रही थी. बहू ने बताया कि उनके पिता के कान से भी सोने की बाली खींच ली थी. इसका घाव आज भी है, जो कि उस भयंकर मंजर की याद दिलाता है. इंडिया में बसने को बाद उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की. इसके बाद वह भारतीय वायुसेना में शामिल हो गए. रामजीदास कहते हैं कि कहते है की वह समय बहुत मुश्किल था. गुजारे के लिए मजदूरी की, लेकिन मेहनत कर एयर फोर्स पहुंच गए.

मुस्लिम पड़ोसियों ने बचाई जान

पंजाब के गुरदासपुर जिले के बटाला में रहने वाले पूरन चंद की भी यहीं कहानी है. वह बंटवारे के चार महीने बाद भारत आए थे. उनके बेटे भगत चंद बताते हैं कि हमारे परिवार की जान मुस्लिम पड़ोसियों ने अपने घर में छिपाकर बचाई. बाद में भारत सरकार ने पाकिस्तान में बचे हिंदुओं को मिलिट्री ट्रक से लाकर राहत कैंपों में ठहराया. पूरन चंद के पास आज भी अपने दादा का 200 साल पुराना हुक्का है, जिसे वह पाकिस्तान से लाए थे.

पूरन चंद ने क्या कहा?

पूरन चंद कहते हैं कि अगर मौका मिले तो भागकर पाकिस्तान जाऊंगा, लेकिन अफसोस है कि भरा-पूरा घर छोड़कर खाली हाथ आना पड़ा. इसी तरह अमृतसर के कारोबारी सुनील बताते हैं कि बंटवारे के समय उनके दादा भजन लाल की उम्र 28 साल थी. परिवार अमृतसर में रहता था, लेकिन कारोबार पाकिस्तान में था. ट्रांसपोर्ट और मर्चेंट टैक्स टाइल का. ‘जलियांवाला बाग के आसपास भी हालात बिगड़े.

विभाजन की त्रासदी

अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति ने सब तहस-नहस कर दिया.हर जगह यह बोला जा रहा था कि बड़ी हवेलियों को निशाना बनाया जाए यानी बड़ी हवेलियों को तोड़ेंगे तो लोगों ज्यादा मरेंगे , छोटे घरों में क्या होगा. बंटवारे में हमारा सारा कारोबार खत्म हो गया नहीं, तो आज हम करोड़पति होते. 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, लेकिन विभाजन की त्रासदी ने लाखों लोगों को उजाड़ दिया. लाखों परिवार विस्थापित हुए कारोबार बर्बाद हुए और नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की लड़ाई आज भी जारी है.

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.