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‘मर्द औरतों को कंट्रोल क्यों करना चाहते हैं?’: राहुल गांधी ने पुणे में छात्राओं से किया सीधा संवाद, अधिकारों पर हुई चर्चा

पुणे (महाराष्ट्र): लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने शनिवार को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शिरकत की। इस दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में उपस्थित छात्राओं से सीधा संवाद स्थापित करते हुए कहा कि भारत की वास्तविक और सबसे बड़ी ताकत देश की 70 करोड़ महिलाएं हैं। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज समाज में महिलाओं की क्षमता को अक्सर केवल तीन पारंपरिक भूमिकाओं—पत्नी, बेटी और मां तक सीमित कर दिया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये रिश्ते और भूमिकाएं अपने आप में गलत नहीं हैं, लेकिन महिलाओं की समग्र पहचान केवल इन्हीं दायरों में सिमट कर नहीं रहनी चाहिए।

📖 ‘मनुस्मृति की सोच शर्मनाक, महिलाओं की अपनी स्वतंत्र पहचान जरूरी’

सामाजिक मान्यताओं पर राहुल गांधी का दृष्टिकोण:

  • रूढ़िवादिता पर प्रहार: राहुल गांधी ने कहा कि पुरानी व्यवस्थाओं और मनुस्मृति जैसी सोच में यह माना गया कि स्त्री बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्र के अधीन रहती है, जो आज के लोकतांत्रिक और आधुनिक दौर में अत्यंत अनुचित है।

  • स्वावलंबन और स्वतंत्रता: उन्होंने छात्राओं से कहा, “आप किसी पर निर्भर नहीं हैं। पिता, पति और बेटे के साथ आपके खूबसूरत रिश्ते हो सकते हैं, लेकिन आपकी निजी पहचान इनसे नहीं बनती। आपकी अपनी एक स्वतंत्र पहचान और वजूद है।”

  • खुला मंच: उन्होंने कहा कि वे यहां कोई राजनीतिक भाषण देने नहीं आए हैं, बल्कि छात्राओं के विचारों, अपेक्षाओं और उनकी सोच को गहराई से सुनने व समझने आए हैं।

❓ ‘पुरुष महिला पर नियंत्रण क्यों रखना चाहता है?’: पितृसत्ता पर राहुल का सवाल

संवाद के दौरान उभरे मुख्य विचार:

  • नियंत्रण की मानसिकता पर सवाल: राहुल गांधी ने बातचीत के दौरान छात्राओं से पूछा कि आखिर पुरुष महिलाओं पर नियंत्रण क्यों रखना चाहते हैं और क्या यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हिस्सा है।

  • युवती का सशक्त जवाब: एक छात्रा ने उत्तर देते हुए कहा, “मैं खुद को सबसे पहले एक स्वतंत्र इंसान मानती हूं। जब लोग कहते हैं कि ‘तुम तो बस एक औरत हो’ या ‘खूबसूरत हो तो कोई शादी कर लेगा और जिंदगी कट जाएगी’, तब गहरा रोष होता है। अब समय बदल रहा है और महिलाएं अपना करियर खुद गढ़ रही हैं।”

💼 ‘महिलाओं को उनका अधिकार देना कोई एहसान नहीं’: बराबरी के हक पर मंथन

समान अधिकार और पारिवारिक सोच में बदलाव:

  • हक बनाम एहसान: राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि जब परिवार में बेटा हिस्सा मांगता है तो उसे उसका जन्मसिद्ध अधिकार समझा जाता है, लेकिन जब बेटी मांगती है तो उसे ‘मांगना’ या ‘एहसान’ क्यों माना जाता है।

  • पारिवारिक दोहरे मापदंड: इस पर छात्राओं ने सहमति जताते हुए कहा कि कई परिवारों में आज भी यह अपेक्षा की जाती है कि महिला नौकरी करने के साथ-साथ घर-गृहस्थी और रसोई की पूरी जिम्मेदारी अकेले उठाए।

  • समानता का संदेश: संवाद में यह निष्कर्ष निकलकर आया कि महिलाओं को उनके अधिकार, संपत्ति में हिस्सा और निर्णय लेने की आजादी देना कोई परोपकार नहीं, बल्कि उनका बुनियादी और संवैधानिक अधिकार है।

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