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भरण-पोषण केस में MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: प्राइवेसी के नाम पर खारिज नहीं कर सकते कॉल रिकॉर्डिंग, फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त

जबलपुर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने पति-पत्नी के विवाद और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की एकलपीठ ने छतरपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें पति को अपनी पत्नी को प्रतिमाह ₹6,000 भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवादों में किसी भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (जैसे कॉल रिकॉर्डिंग या ऑडियो सीडी) को सिर्फ इसलिए दरकिनार नहीं किया जा सकता कि वह बिना सहमति की निजी बातचीत है। अदालत को पहले यह परखना होगा कि वह साक्ष्य मामले के निपटारे के लिए कितना प्रासंगिक, सत्य और विश्वसनीय है।

📜 पत्नी पर व्यभिचार का आरोप, पति ने पेश की थी फोन कॉल रिकॉर्डिंग की सीडी

यह मामला राम कुमार और उनकी पत्नी (काल्पनिक नाम कविता) के बीच उपजे पारिवारिक विवाद से जुड़ा है:

  • फैमिली कोर्ट का आदेश: पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की अर्जी लगाई थी, जिस पर 24 जनवरी 2018 को छतरपुर फैमिली कोर्ट ने पति को ₹6,000 प्रतिमाह देने का आदेश दिया था।

  • हाईकोर्ट में अपील: इस आदेश के खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि पत्नी व्यभिचार (Adultery) में रह रही है और उसके अन्य व्यक्तियों के साथ संबंध हैं।

  • CrPC धारा 125(4) का हवाला: पति ने दलील दी कि कानून की धारा 125(4) के तहत व्यभिचार में रहने वाली पत्नी को भरण-पोषण पाने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। अपने दावे को साबित करने के लिए पति ने बातचीत की ऑडियो सीडी और लिखित ट्रांसक्रिप्ट कोर्ट में प्रस्तुत की थी।

🔍 फैमिली कोर्ट की प्रक्रियात्मक चूक पर हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने साक्ष्य स्वीकार करने की प्रक्रिया में विधिक त्रुटि की थी:

  • साक्ष्य की अनदेखी: फैमिली कोर्ट ने 18 दिसंबर 2017 को सीडी और ट्रांसक्रिप्ट को द्वितीयक साक्ष्य (Secondary Evidence) के रूप में स्वीकार तो किया, लेकिन बाद में बिना ठोस कारण दर्ज किए उसे प्रदर्श (Exhibit) बनाने से रोक दिया।

  • पक्ष रखने का अवसर नहीं: इसके अतिरिक्त, पति द्वारा पेश किए गए इस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का खंडन करने या उस पर अपनी बात रखने का समुचित अवसर पत्नी को भी नहीं दिया गया था।

🛡️ प्राइवेसी बनाम इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य: सुप्रीम कोर्ट की मिसालों का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णयों का संदर्भ देते हुए कानूनी स्थिति को स्पष्ट किया:

  • सत्यता की जांच जरूरी: अदालत ने कहा कि किसी ऑडियो या कॉल रिकॉर्डिंग को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह बिना सहमति के रिकॉर्ड की गई है या उससे निजता का हनन होता है।

  • प्रासंगिकता सर्वोपरि: न्यायालय को सबसे पहले साक्ष्य की सत्यता, आवाज की पहचान (Voice Identification), प्रासंगिकता और रिकॉर्डिंग की मौलिकता की जांच करनी चाहिए।

  • फैमिली कोर्ट के अधिकार: पारिवारिक विवादों के निष्पक्ष और न्यायपूर्ण समाधान के लिए फैमिली कोर्ट के पास व्यापक अधिकार हैं, इसलिए केवल तकनीकी आधार पर अहम साक्ष्यों को प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।

📅 16 सितंबर 2026 को फैमिली कोर्ट में दोबारा होगी सुनवाई, नए सिरे से होगा फैसला

हाईकोर्ट ने मामले को अंतिम रूप से निपटाने के बजाय प्रक्रियात्मक सुधार के साथ वापस विचार के लिए भेज दिया है:

  • मामला पुनर्विचार के लिए भेजा: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने पत्नी पर लगे आरोपों को सही या गलत नहीं ठहराया है, बल्कि केवल प्रक्रियात्मक खामी को सुधारा है।

  • 16 सितंबर 2026 की तारीख: दोनों पक्षों को 16 सितंबर 2026 को छतरपुर फैमिली कोर्ट के समक्ष उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं।

  • नए सिरे से आदेश: अब फैमिली कोर्ट ऑडियो सीडी, ट्रांसक्रिप्ट और दोनों पक्षों की जिरह का दोबारा परीक्षण कर नया निर्णय पारित करेगी।

  • अंतरिम व्यवस्था: जब तक फैमिली कोर्ट से नया आदेश जारी नहीं हो जाता, तब तक पति को अंतरिम राहत के रूप में ₹6,000 का मासिक भुगतान जारी रखना होगा।

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