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कागजों में सिमटे 450 सरकारी सेवाओं के दावे: प्रमाण पत्रों के लिए डीसी दफ्तर के चक्कर काट रहे लोग

जालंधर (पंजाब): जिले में स्थापित 35 सेवा केंद्रों के माध्यम से आम जनता को लगभग 450 नागरिक सेवाएं समयबद्ध उपलब्ध कराने के सरकारी दावे धरातल पर पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं।

हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि सेवा केंद्रों में तीन-तीन महीने पहले आवेदन करने के उपरांत भी सैकड़ों जरूरतमंदों को अनुसूचित जाति (SC), आय, जन्म-मृत्यु, विवाह, रिहायशी और स्वास्थ्य प्रमाण पत्र जारी नहीं हो पा रहे हैं। सिस्टम से हताश होकर लोग अपने वैध दस्तावेज हासिल करने के लिए रोजाना डिप्टी कमिश्नर कार्यालय और तहसीलों की धूल फांक रहे हैं। स्थिति यह है कि सेवा केंद्र में स्टेटस पूछने पर आवेदक को तहसीलदार के पास, तहसीलदार से पटवारी और पटवारी से क्लर्क के पास भेजकर केवल एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर भटकाया जा रहा है।

📉 नंबर-1 से 23वें पायदान पर फिसला जालंधर: 1 लाख से ज्यादा आवेदन धूल फांक रहे

नागरिक सेवाओं की डिलीवरी में भारी गिरावट:

  • ऐतिहासिक प्रदर्शन से पतन: पूर्व उपायुक्तों घनश्याम थोरी और विशेष सारंगल के कार्यकाल में जालंधर जिला नागरिक सेवाओं के त्वरित निपटारे में पूरे पंजाब में पहले पायदान पर रहता था।

  • 17.70% पेंडेंसी दर: ई-सेवा पोर्टल के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा समय में जालंधर जिला पेंडेंसी के मामले में प्रदेश में 23वें स्थान पर लुढ़क चुका है।

  • लाखों फाइलें अधर में: जिले में 1 लाख से अधिक महत्वपूर्ण फाइलें अप्रूवल की प्रतीक्षा में अटकी हुई हैं, जिससे प्रशासनिक संवेदनशीलता और मॉनिटरिंग पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग गया है।

❓ प्रशासनिक मॉनिटरिंग पर तीखे सवाल: किसकी आईडी में फंसी हैं फाइलें?

जवाबदेही और समीक्षा का अभाव:

  • समीक्षा की कमी: फाइलों के महीनों लंबित रहने के बावजूद इस बात की कोई दैनिक समीक्षा नहीं हो रही है कि किस अधिकारी, पटवारी या क्लर्क की डिजिटल आईडी में कितने आवेदन अटके पड़े हैं।

  • टारगेट और जवाबदेही तय नहीं: क्या जिला स्तर पर अधिकारियों को समय-सीमा देकर फाइलों का निपटारा करने के निर्देश दिए गए हैं? यदि नियमित समीक्षा हो रही है, तो जिला पेंडेंसी में 23वें पायदान पर क्यों पहुंचा?

  • जनता की अनदेखी: भीषण गर्मी के बीच कॉलेज में दाखिला कराने वाले छात्र और मतदाता सूची (SIR) संशोधन के लिए जरूरी दस्तावेज जुटाने वाले नागरिक सुबह से शाम तक धक्के खाने को विवश हैं।

🤦‍♀️ ‘कर्मचारी काम न कर सकें इसलिए बाहर बैठाया’: तहसीलदार जालंधर-1 का अजीबोगरीब तर्क

अधिकारियों की कार्यशैली और तर्क:

  • सीटों से कर्मचारी नदारद: पब्लिक डीलिंग के समय तहसीलदार कार्यालय की सीटों से स्टाफ के गायब रहने पर तहसीलदार जालंधर-1 स्वप्नदीप कौर ने हैरान करने वाला तर्क दिया।

  • कार्यालय से बाहर शिफ्टिंग: उन्होंने कहा कि आवेदक प्रमाण पत्रों के लिए कर्मचारियों को बार-बार परेशान करते हैं, जिससे उनके काम में बाधा आती है; इसलिए संबंधित कर्मियों को कार्यालय से बाहर डीसी दफ्तर के किसी अन्य हिस्से में बैठाकर काम कराया जा रहा है।

  • अधिकारियों की अनुपस्थिति: तहसीलदार ने यह भी स्वीकारा कि एसआईआर (SIR) ड्यूटी में व्यस्त रहने के कारण वे स्वयं भी अक्सर दफ्तर में उपस्थित नहीं रह पातीं।

🤝 पेंडेंसी के खेल में एजेंटों की चांदी: जनता परेशान, बिचौलियों का नेटवर्क हावी

प्रशासनिक विफलता और दलालों का जाल:

  • दलालों का बोलबाला: सरकारी मशीनरी की सुस्ती का सीधा लाभ बिचौलियों और एजेंटों को मिल रहा है। जहां आम नागरिक महीनों चक्कर काट रहा है, वहीं एजेंटों के माध्यम से आने वाली फाइलों को कथित तौर पर प्राथमिकता से निपटाया जा रहा है।

  • सिस्टम से मजबूरी: जटिल और थकाऊ प्रक्रिया के कारण आम नागरिक लाचार होकर अवैध कमीशन और एजेंटों का सहारा लेने पर मजबूर हो रहा है, जो पारदर्शी नागरिक सेवा व्यवस्था के मूल उद्देश्यों पर सीधा कुठाराघात है।

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सरकार की साख और प्रशासनिक मशीनरी:

  • सरकारी प्रयासों पर पानी: एक तरफ पंजाब सरकार मुफ्त बिजली, महिलाओं को वित्तीय मदद और जनहितैषी योजनाओं से आम जनता को राहत देने में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ फील्ड स्तर पर अधिकारियों की लापरवाही सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा रही है।

  • समय पर दस्तावेज जरूरी: जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ लाभार्थियों को तभी मिलता है जब उन्हें आवश्यक प्रमाण पत्र समय पर उपलब्ध हों। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन लंबित फाइलों की जवाबदेही तय कर जनता को राहत देता है या यह विसंगति यूं ही जारी रहेगी।

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