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रायसेन साइकिल घोटाले में हाईकोर्ट सख्त: EOW के डीजी उपेंद्र जैन को व्यक्तिगत रूप से किया तलब

जबलपुर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रायसेन जिले के चर्चित साइकिल वितरण घोटाले में आर्थिक अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ (EOW) की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया है।

अभियोजन की औपचारिक स्वीकृति मिलने के लगभग पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) पेश न किए जाने को हाईकोर्ट ने अत्यंत गंभीरता से लिया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति अवनीन्द्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ईओडब्ल्यू के महानिदेशक (DG) उपेंद्र जैन को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है।

🚴 2013 के साइकिल वितरण फंड से जुड़ा मामला: शिक्षकों ने लगाई थी FIR रद्द करने की गुहार

मामले की पृष्ठभूमि और शिक्षकों का पक्ष:

  • शिक्षकों की याचिका: रायसेन जिले की बरेली तहसील में पदस्थ सहायक शिक्षक सीमा धाकड़ और उमराव धाकड़ ने ईओडब्ल्यू द्वारा दर्ज प्राथमिकी (FIR) को निरस्त करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

  • फंड आवंटन और वितरण: याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वर्ष 2013 में पात्र छात्रों को साइकिल वितरण के लिए उनके बैंक खातों में राशि हस्तांतरित की गई थी। संबंधित प्राचार्य ने उनके खातों से वह राशि आहरित कर साइकिल क्रय करने हेतु पात्र विद्यार्थियों को नकद वितरित करा दी थी।

  • EOW की प्राथमिकी: बाद में ईओडब्ल्यू ने वित्तीय अनियमितताओं की जांच के उपरांत दोनों सहायक शिक्षकों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज कर लिया था।

⏳ सह-आरोपियों का विचारण समाप्त, याचिकाकर्ताओं पर चार्जशीट तक नहीं: अदालत में दिए गए तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से रखे गए विधिक आधार:

  • ट्रायल पूरा होने का हवाला: सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि इस प्रकरण के अन्य सह-आरोपियों का न्यायिक विचारण (ट्रायल) 8 अगस्त 2023 को ही पूर्ण हो चुका है।

  • स्वीकृति के बाद भी निष्क्रियता: याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध 2 दिसंबर 2021 को ही संबंधित विभाग द्वारा अभियोजन की विधिवत अनुमति दी जा चुकी थी।

  • वर्षों की देरी: इसके बावजूद जांच एजेंसी ने इतने वर्षों तक सक्षम न्यायालय में चार्जशीट दाखिल नहीं की। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग की।

❓ ‘5 साल तक क्यों सोते रहे जांच अधिकारी?’: हाईकोर्ट ने जताई भ्रष्टाचार की आशंका

युगलपीठ की तल्ख टिप्पणियां और नाराजगी:

  • अधिकारियों की भूमिका पर सवाल: युगलपीठ ने टिप्पणी की कि अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद भी आरोप पत्र दाखिल करने में इतनी लंबी देरी प्रथम दृष्टया जांच अधिकारी और संबंधित प्रशासनिक अफसरों की भूमिका पर गंभीर संशय पैदा करती है।

  • भ्रष्टाचार का अंदेशा: कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि इस प्रकार का अनुचित विलंब जांच एजेंसी के भीतर भ्रष्टाचार और मिलीभगत की आशंका को जन्म देता है।

  • हलफनामे पर असंतोष: पूर्व में ईओडब्ल्यू के डीजी द्वारा प्रस्तुत जवाब/हलफनामे पर पीठ ने पूर्ण असंतोष जताया और पूछा कि वर्ष 2021 से 2025 तक जांच अधिकारी प्रभावी कदम उठाने के बजाय केवल कागजी पत्राचार में ही क्यों उलझे रहे?

🏛️ डीजी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश: स्पष्टीकरण की मांग

अदालत के निर्देश और आगे की प्रक्रिया:

  • तारीखों के अंतर पर कानूनी सवाल: अदालत ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि कवरिंग लेटर और सेंक्शन लेटर की तारीखों में विसंगति का हवाला देकर चार्जशीट रोकने का क्या कानूनी आधार था।

  • सशरीर उपस्थिति का आदेश: युगलपीठ ने ईओडब्ल्यू डीजी को न्यायालय के समक्ष व्यक्तिगत रूप से हाजिर होकर इन सभी प्रशासनिक व कानूनी चूकों पर विस्तृत स्थिति स्पष्ट करने का आदेश जारी किया है।

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