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बुरहानपुर का प्राचीन श्री गोकुल चंद्रमाजी मंदिर: 221 वर्ष पुरानी हस्तलिखित श्रीमद्भागवत बनी आस्था का केंद्र

बुरहानपुर (मध्य प्रदेश): जिले के इतवारा क्षेत्र स्थित ऐतिहासिक श्री गोकुल चंद्रमाजी मंदिर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और पारंपरिक गरिमा के साथ मनाया जाता है।

यह मंदिर केवल अपनी प्राचीन वास्तुकला के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अमूल्य आध्यात्मिक और ऐतिहासिक खजाने के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां करीब 221 वर्ष पुरानी हस्तलिखित श्रीमद्भागवत महापुराण की अत्यंत दुर्लभ पांडुलिपि आज भी पूरी तरह सुरक्षित रखी गई है। मंदिर में दैनिक पूजा-अर्चना के दौरान इस पावन ग्रंथ का नियमित पूजन किया जाता है और ठाकुर जी के साथ-साथ इस ग्रंथ के समक्ष भी विधिवत भोग अर्पित किया जाता है।

📜 संस्कृत में रचित 18 हजार श्लोक: पौने छह लाख अक्षरों का दुर्लभ संग्रह

पांडुलिपि का स्वरूप और आकार:

  • संस्कृत भाषा में लेखन: इस पावन पांडुलिपि में देववाणी संस्कृत में लगभग 18,000 श्लोक सुलेख शैली में लिखे गए हैं।

  • अक्षरों और पन्नों की संख्या: मुख्य पुजारी हरिकृष्ण मुखियाजी के अनुसार, लगभग ढाई हजार (2,500) पन्नों पर विस्तृत इस ग्रंथ में पौने छह लाख से अधिक अक्षरों को हाथों से उकेरा गया है।

  • आकार और स्वरूप: इस अनमोल ग्रंथ की लंबाई लगभग 1 फीट और चौड़ाई करीब 2 फीट है, जिसे विशेष हस्तनिर्मित पन्नों और प्राकृतिक स्याही से तैयार किया गया था।

👨‍👩‍👧‍👦 5 पीढ़ियों से सहेज कर रखी अनमोल विरासत: पूर्वजों के हाथों से हुई थी तैयार

मुखियाजी परिवार की पांच पीढ़ियों का समर्पण:

  • पूर्वजों की रचना: वर्तमान पुजारियों के पूर्वजों ने कई वर्षों के अथक परिश्रम से अपने हाथों से इस संपूर्ण ग्रंथ की रचना की थी।

  • पांचवीं पीढ़ी कर रही सेवा: परिवार की पांचवीं पीढ़ी इस दुर्लभ धरोहर को भारतीय ज्ञान और सनातन संस्कृति की पावन निशानी के रूप में संरक्षित कर रही है।

  • ज्ञान परंपरा का प्रवाह: पुजारी हरिकृष्ण मुखियाजी ने बताया कि उनके परिवार में उनकी दादी, पिता, स्वयं वे, उनके सुपुत्र और भतीजे ने इसी श्रीमद्भागवत से ज्ञान और संस्कार अर्जित किए हैं।

✨ आधुनिक युग में भी जीवंत है 221 साल पुरानी परंपरा: पुजारी आदित्य महाराज का वक्तव्य

धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक गौरव:

  • गौरवशाली इतिहास: मंदिर के पुजारी आदित्य महाराज ने बताया कि गोकुल चंद्रमाजी मंदिर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है।

  • अक्षुण्ण आस्था: उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक के इस आधुनिक दौर में भी 221 वर्ष पुरानी हस्तलिखित भागवत और उससे जुड़ी धार्मिक परंपराओं को उसी भाव और निष्ठा से जीवित रखा गया है, जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है।

  • जन्माष्टमी का उल्लास: जन्माष्टमी के पावन अवसर पर इस ग्रंथ के दर्शन करने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से शोधार्थी और श्रद्धालु विशेष रूप से बुरहानपुर पहुंचते हैं।

🙏 लाल वस्त्र में सुरक्षित रखा जाता है पावन ग्रंथ: रोजाना दर्शन को उमड़ते हैं श्रद्धालु

दैनिक पूजन और दर्शन की व्यवस्था:

  • विधि-विधान से भोग और आरती: प्रतिदिन सुबह मंदिर के पट खुलते ही ठाकुर जी के विग्रह और श्रीमद्भागवत का विधि-विधान से अभिषेक, आरती और नैवेद्य समर्पण किया जाता है।

  • सुरक्षित रखरखाव: पूजन उपरांत इस ऐतिहासिक ग्रंथ को विशेष लाल रेशमी वस्त्र में लपेटकर सुरक्षित व नमी-मुक्त स्थान पर सम्मानपूर्वक रखा जाता है।

  • श्रद्धालुओं का तांता: मंदिर आने वाले सैकड़ों भक्त इस ग्रंथ को केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि पूर्वजों की उच्च ज्ञान परंपरा और साक्षात प्रभु का वांग्मय स्वरूप मानकर नतमस्तक होते हैं।

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