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Chhindwara Patalkot School: पातालकोट में दावों की खुली पोल, 5 साल से छप्पर वाले कच्चे मकान में पढ़ने को मजबूर मासूम

छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश): मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पातालकोट में रात्रि विश्राम कर यहां की हसीन वादियों, प्राकृतिक संपदा और समृद्ध लोक-संस्कृति की मुक्तकंठ से प्रशंसा की थी।

वहीं, राज्यपाल ने भी पातालकोट के आदिवासी बाहुल्य गांवों का भ्रमण कर वनवासियों के उत्थान और विकास के लिए प्रशासनिक तंत्र की सराहना की थी। स्थानीय अधिकारी भी इस क्षेत्र में चौतरफा विकास और पूर्ण देखरेख का दम भरते नजर आते हैं। परंतु इन सभी सरकारी दावों की जमीनी हकीकत बयां करती एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। पातालकोट के चिमटीपुर स्थित शासकीय प्राथमिक शाला के पास विगत 5 वर्षों से अपना कोई पक्का भवन तक नहीं है, जिसके चलते मासूम बच्चे एक ग्रामीण के छप्पर वाले कच्चे घर में बैठकर तालीम हासिल करने के लिए विवश हैं।

🌧️ प्राकृतिक सौंदर्य के बीच विकास के दावों पर सवाल: तालाबढाना में स्कूल भवन का वर्षों से इंतजार

जमीनी हकीकत और बच्चों की असुविधाएं:

  • प्राकृतिक खूबसूरती का केंद्र: पातालकोट अपनी गहरी घाटियों, सुरम्य वादियों, औषधीय पौधों और भारिया जनजाति की विशिष्ट संस्कृति के लिए वैश्विक मानचित्र पर विख्यात है। देश-विदेश से पर्यटक इस प्राकृतिक सौंदर्य को निहारने खिंचे चले आते हैं।

  • भवन विहीन प्राथमिक शाला: इसी पातालकोट के ग्राम तालाबढाना में संचालित ‘एकीकृत शाला चिमटीपुर’ की प्राथमिक इकाई प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है।

  • बारिश में गंभीर चुनौती: स्कूल भवन के अभाव में बच्चों को कच्चे मकान की असुविधाजनक और बदहाल स्थिति में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। बरसात के दिनों में छप्पर से पानी टपकने और सीलन के कारण पढ़ाई करना बेहद जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

👨‍🏫 5 वर्षों में शिक्षक बदले पर नहीं बदली स्कूल की तस्वीर: डीईओ ने दिया निर्माण का आश्वासन

ग्रामीणों की शिकायत और शिक्षा विभाग का पक्ष:

  • वर्षों पुरानी समस्या: स्थानीय ग्रामीण गोलू भारती ने बताया कि स्कूल भवन की अनुपलब्धता का संकट आज का नहीं, बल्कि पिछले 5 वर्षों से लगातार बना हुआ है।

  • शिक्षकों का आना-जाना जारी: इस अवधि में कई शिक्षक बदले और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर चले गए, परंतु जर्जर और कच्चे मकान में पढ़ाई करने की नौबत जस की तस बनी रही।

  • जिला शिक्षा अधिकारी का बयान: इस मामले पर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) जगदीश प्रसाद इढ़पाचे ने बताया कि गांव के लिए शासन स्तर से नए स्कूल भवन की स्वीकृति मिल चुकी है। वर्षा ऋतु समाप्त होते ही भवन का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर शुरू करा दिया जाएगा।

🛖 भारिया आदिवासी गोल भारती की मिसाल: बच्चों के भविष्य के लिए बिना किराए के दे दिया अपना घर

एक नागरिक की कर्तव्यनिष्ठा और दरियादिली:

  • 5 साल पहले ढह गई थी बिल्डिंग: करीब पांच वर्ष पूर्व मूसलाधार बारिश के चलते स्कूल का पुराना जर्जर ढांचा गिर गया था, जिसके बाद नौनिहालों के अध्ययन का क्रम पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गया था।

  • निःशुल्क दिया आशियाना: ऐसी विषम परिस्थिति में गांव के ही भारिया जनजाति के व्यक्ति गोल भारती ने बच्चों के भविष्य को देखते हुए अपना निजी मकान स्कूल संचालन हेतु सौंप दिया।

  • बिना किसी स्वार्थ के सेवा: गोल भारती ने बताया कि वे प्रशासन से न तो कोई किराया लेते हैं और न ही उन्हें रखरखाव का कोई खर्च मिलता है। उनकी केवल एक ही दिली तमन्ना है कि गांव के बच्चों के लिए जल्द से जल्द एक सुरक्षित और पक्का स्कूल भवन निर्मित हो सके।

🪨 घने जंगलों और पथरीले रास्तों से होकर स्कूल पहुंचते हैं बच्चे: मूलभूत सुविधाओं का अभाव

दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां और आवागमन की बाधाएं:

  • 12 गांवों का इलाका: पातालकोट क्षेत्र के अंतर्गत कुल 12 पारंपरिक गांव आते हैं, जिनमें पहाड़ी के ऊपरी छोर पर चिमटीपुर कस्बा स्थित है।

  • सड़क विहीन पथरीले रास्ते: स्कूल तक पहुंचने के लिए आज भी पक्की सड़कों का भारी अभाव है। नन्हें विद्यार्थियों को घने जंगलों और कच्चे-पथरीले संकरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है।

  • प्रशासनिक अनदेखी: बरसात के दिनों में फिसलन और जलभराव के चलते इन पहाड़ी रास्तों पर चलना दुर्घटनाओं को न्योता देने जैसा होता है, परंतु अब तक शासन स्तर से सुगम मार्ग और आधारभूत ढांचे के विकास पर ठोस कदम नहीं उठाए जा सके हैं।

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