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ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में केंद्र को सुप्रीम कोर्ट से झटका: अंतरिम राहत देने से इनकार, अब 17 सितंबर को अगली सुनवाई

नई दिल्ली: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) क्रीमी लेयर निर्धारण से जुड़े बहुचर्चित मामले में मंगलवार को उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में अहम सुनवाई हुई।

केंद्र सरकार ने 11 मार्च को दिए गए शीर्ष अदालत के ऐतिहासिक आदेश में संशोधन और तात्कालिक अंतरिम राहत की मांग की थी। हालांकि, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने केंद्र को कोई भी तत्काल राहत देने से साफ इनकार कर दिया और मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर के लिए तय कर दी।

📜 11 मार्च के फैसले में क्या था?: केवल वेतन आय क्रीमी लेयर का आधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट के मूल फैसले के मुख्य बिंदु:

  • वेतन के आधार पर भेदभाव नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च के अपने निर्णय में स्पष्ट किया था कि ओबीसी में क्रीमी लेयर तय करने के लिए केवल माता-पिता की वेतन आय को एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता।

  • समानता का सिद्धांत: अदालत ने व्यवस्था दी थी कि PSU, बैंकों या निजी क्षेत्र में कार्यरत अभिभावकों के बच्चों को मात्र इसलिए आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका वेतन निर्धारित सीमा से अधिक है।

  • संवैधानिक उल्लंघन: खंडपीठ ने माना था कि इस प्रकार का वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता के मूल अधिकारों का हनन करता है।

🗣️ सॉलिसिटर जनरल की दलील: ‘पिछली तारीख से लागू करने पर पैदा होगी प्रशासनिक अराजकता’

केंद्र सरकार का विधिक पक्ष:

  • भूतलक्षी प्रभाव की कठिनाइयां: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि फैसले को पिछली तारीख (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू करने पर गंभीर प्रशासनिक मुश्किलें आ सकती हैं।

  • कैडर और पदों में बदलाव का संकट: इस आदेश के चलते पुराने बैचों के कई ओबीसी उम्मीदवारों को नॉन-क्रीमी लेयर में पुनः वर्गीकृत करना पड़ेगा।

  • अखिल भारतीय सेवाओं पर असर: आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS) और आईएफएस (IFS) जैसी शीर्ष सेवाओं में वर्षों से तैनात अधिकारियों के कैडर, सेवा और वरिष्ठता क्रम को बदलना पड़ेगा, जिससे भारी प्रशासनिक अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है।

🏛️ 18 राज्यों की भर्तियों और उच्च शिक्षा पर दूरगामी प्रभाव का हवाला

सरकार द्वारा प्रस्तुत संभावित प्रभाव:

  • भर्तियों और दाखिलों पर संकट: केंद्र सरकार ने रेखांकित किया कि बिना ठोस नीतिगत हस्तक्षेप के इसे लागू करने से केंद्र सहित 18 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही सरकारी भर्तियों और उच्च शिक्षण संस्थानों की प्रवेश प्रक्रिया पर गहरा असर पड़ेगा।

  • लाखों मुकदमों की आशंका: रेलवे, डाक विभाग, बैंक और अर्धसैनिक बलों जैसे विशाल नियोक्ताओं को री-क्लासिफिकेशन (पुनः वर्गीकरण) से जुड़े लाखों नए दावों और कानूनी मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है।

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