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छिंदवाड़ा: सावन-भादों में पलाश के पत्तों से जीवंत हो रही सदियों पुरानी परंपरा, आजीविका और आस्था का अनूठा संगम

छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश): सावन और भादों के पावन महीने में आस्था और प्रकृति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। देशभर के प्रमुख मंदिरों और शिवालयों में महादेव के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है।

इसी पावन अवसर पर छिंदवाड़ा की सड़कों के किनारे ग्रामीण महिलाएं और कारीगर पलाश (ढाक) के पत्तों से पारंपरिक दोना और थाल तैयार करते नजर आ रहे हैं। यह न केवल सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति और पर्यावरण अनुकूल परंपरा को जीवित रखने का माध्यम है, बल्कि कई स्थानीय गरीब परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन भी बना हुआ है।

🌾 भुजलिया (कजलिया) पर्व और रक्षाबंधन पर पलाश के पत्तों का विशेष महत्व

लक्ष्मी नारायण मंदिर के पुजारी पंडित सुनील दुबे के अनुसार, हिंदू धर्म में भुजलिया (कजलिया) का पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है:

  • बोने और विसर्जन की परंपरा: भुजलिया को कई क्षेत्रों में हरियाली अमावस्या या नाग पंचमी पर मिट्टी के दोने में गेहूं बोकर तैयार किया जाता है और रक्षाबंधन के दूसरे दिन विधि-विधान से विसर्जित किया जाता है।

  • बधाई और आशीर्वाद: विसर्जन से पूर्व इस पावन भुजलिया को भगवान, कुलदेवता और पूर्वजों को अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात छोटे अपने बड़े-बुजुर्गों को भुजलिया भेंट कर चरण स्पर्श करते हैं और आपस में गले मिलकर पर्व की शुभकामनाएं देते हैं।

🌲 जंगलों में अब दुर्लभ हो रहे पलाश के पत्ते, आजीविका के लिए करना पड़ रहा कड़ा संघर्ष

पलाश के पत्तों से दोना-पत्तल तैयार करने वाली शिव कुमारी बंदेवार ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि वे विवाह के बाद से ही इस पारंपरिक कार्य से जुड़ी हुई हैं।

सावन-भादों और त्योहारी सीजन में इन दोनों की मांग बहुत बढ़ जाती है और व्यवसाय अच्छा चलता है। हालांकि, अब जंगलों और ग्रामीण इलाकों में पलाश के पेड़ कम होने के कारण पत्तों को ढूंढने के लिए मीलों दूर तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। वे इन दोना-पत्तलों की बिक्री और अन्य छोटे-मोटे कार्यों के जरिए अपने परिवार का भरण-पोषण करती हैं।

✨ पलाश के पत्तों में त्रिदेवों का वास, शास्त्रों में स्वर्ण पत्र के समान फलदायी

पंडित सुनील दुबे ने बताया कि हिंदू धर्मग्रंथों में पलाश के वृक्ष और उसके पत्तों को अत्यंत पवित्र और पूजनीय स्थान दिया गया है:

  • त्रिदेवों की उपस्थिति: पलाश के तीन पत्तों के समूह में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान महेश (शिव) का साक्षात वास माना गया है।

  • स्वर्ण पत्र के समान फल: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पलाश के पत्तों पर भगवान को नैवेद्य अर्पित करने या इस पर भोजन ग्रहण करने से सोने के पात्र में भोजन करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी कारण हर प्रकार के मांगलिक अनुष्ठान, पूजन और भुजलिया विसर्जन में पलाश के पत्तों का उपयोग अनिवार्य माना जाता है।

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