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64 तारीखें, 35 सुनवाई टली…12 साल तक पत्नी का गुजारा भत्ता रोके रहा जज; अब हाई कोर्ट ने सुनाया अनोखा फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विशेष न्यायाधीश अली रजा के वेतन खाते से प्रत्येक माह 20 हजार उनकी पत्नी को गुजारा भत्ता देने के निर्देश दिए हैं. अली रजा की 2002 में शबाना बानो से शादी हुई थी. हालांकि, 2013 में जज ने अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया था. पत्नी ने कोर्ट का सहारा लिया. फैमिली कोर्ट में चली लंबी बहस के बाद कोर्ट ने विशेष न्यायाधीश अली रजा को अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था, लेकिन 12 बीत जाने के बाद भी आज तक जज ने अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं दिया.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज विनोद दिवाकर ने शबाना बानो की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक न्यायिक अधिकारी जिसे अपनी पत्नी के अधिकारों का पता था, उनसे पत्नी को गुजारा भत्ता देने बजाय उसे 12 साल तक कानूनी प्रक्रिया में उलझाए रखा. मामले में फैमिली कोर्ट ने गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे. बावजूद एलिमनी राशि नहीं दी गई. कोर्ट ने आगे कहा कि पति ने कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है. उन्होंने पत्नी के साथ कानूनी लड़ाई जारी रखकर न्याय में देरी की.

छह महीने में पूरा गुजारा भत्ता देने के निर्देश

कोर्ट ने कहा कि पत्नी सहानुभूित भी हकदार है. वह याचिका दाखिल करने की तारीख से ही गुजारा भत्ता पाने की हकदार है. जज विनोद दिवाकर ने तीन सप्ताह में 50 हजार रुपये वाद खर्च सहित पूरा बकाया छह महीने में भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है. चार मई 2002 को जज अली रजा और शबाना बानो का निकाह हुआ था. पत्नी ने बताया कि जिस समय उनकी शादी हुई उस समय अली रजा सिविल जज थे.

सुनवाई में नहीं हुआ शामिल

शादी में उनके परिवार ने 30 लाख रुपये दिए थे. साथ ही एक इंडिका कार भी दी थी. हालांकि, इसके बावजूद भी 20 लाख अतिरिक्त मांगे. दोनों के चार बच्चे है, जिसमें तीन लड़की और एक लड़का है. सभी बच्चे पिता के साथ थे. विवाद के बाद 18 नवंबर 2013 को अली रजा ने अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया और फिर अगले ही महीने उसे तलाकनामा भेज दिया था.कोर्ट ने कहा कि मुकदमे में 15 जनवरी 2014 से कोर्ट में 64 बार तारीख लगी, लेकिन पति एक में भी शामिल नहीं हुआ.

मिडियेशन में 35 बार टली सुनवाई

इसके बाद मामला मिडियेशन में गया, जहां से पति ने 35 बार सुनवाई टलवाई थी. इसके बाद पति ने गुजारा भत्ता की याचिका लगाई थी, जिसमें करीब 47 तारीख लगी. हालांकि, इसमें भी पति शामिल नहीं हुआ था. इसके बाद कोर्ट ने पति को आदेश दिया था कि वह पत्नी को गुजारा भत्ता दे.

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