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सदाशिवपेट में 400 साल पुरानी ऐतिहासिक पुष्करिणी: इतिहास, संस्कृति और आस्था का बेजोड़ संगम

संगारेड्डी (तेलंगाना): जिले के सदाशिवपेट अंतर्गत राघवेंद्रनगर में स्थित एक प्राचीन सीढ़ीदार कुआं (बावड़ी) आज भी इतिहास, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है।

स्थानीय श्रद्धालु इसे पवित्र ‘पुष्करिणी’ मानकर पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजते हैं। लगभग 400 वर्ष पूर्व निर्मित यह भव्य और उत्कृष्ट संरचना वर्तमान में भी पूरी तरह सुरक्षित अवस्था में है और इसमें वर्षभर निर्मल जल लबालब भरा रहता है। यह जल संरचना प्राचीन भारत के उन्नत जल प्रबंधन, दूरदर्शिता और बेजोड़ इंजीनियरिंग कौशल का प्रत्यक्ष प्रमाण है। यह बावड़ी केवल पेयजल का स्रोत नहीं, बल्कि एक सिद्ध धार्मिक तीर्थ स्थल है।

💧 औषधीय जल और आध्यात्मिक विश्वास: स्नान से दूर होते हैं सभी प्रकार के रोग

पुष्करिणी की महिमा और जन-आस्था:

  • रोगमुक्ति का विश्वास: स्थानीय निवासियों में यह दृढ़ मान्यता है कि इस पुष्करिणी का पवित्र जल ग्रहण करने और इसमें स्नान करने से असाध्य शारीरिक व्याधियां व त्वचा संबंधी रोग दूर हो जाते हैं।

  • जीवन में शुभता: इसे चमत्कारी जल मानकर लोग अपने घरों में छिड़काव करते हैं, जिससे परिवार में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

  • मंदिर से जुड़ाव: इस तेजस्वी पुष्करिणी का सीधा धार्मिक संबंध समीप स्थित प्रसिद्ध एवं प्राचीन श्री जानकी रघुनाथस्वामी मंदिर से है।

🌸 जनकम्मा और रघुनाथ महाराज की पावन गाथा: भस्म की जगह खिले थे दिव्य पुष्प

मंदिर के प्राकट्य से जुड़ी अमर गाथा:

  • तपोभूमि एनीकेपल्ली: प्राचीन जनश्रुतियों के अनुसार, मातृश्री जनकम्मा और रघुनाथ महाराज सदाशिवपेट से लगभग 3 किलोमीटर दूर एनीकेपल्ली गांव के निकट नियमित रूप से होम-यज्ञ और तपस्या किया करते थे।

  • सतीत्व और सहगमन: कार्तिक बहुला एकादशी के पावन दिन जब योगी रघुनाथ स्वामी ने अपनी देह त्यागी, तब उनकी धर्मपत्नी जनकम्मा ने भी चिता में प्रवेश कर सहगमन किया।

  • चमत्कारी अवशेष: मान्यता है कि अग्नि शांत होने के बाद चिता स्थल पर राख (भस्म) के स्थान पर ताजे और सुगंधित पुष्प शेष मिले। इसी पावन स्थल पर मंदिर का निर्माण कराया गया और तब से क्षेत्रवासी उन्हें प्रत्यक्ष देवता के रूप में पूजते हैं।

✨ कुष्ठ रोगी करोड़पति का स्वप्न और निर्माण: आभार स्वरूप बनवाई थी भव्य बावड़ी

बावड़ी निर्माण की दिलचस्प ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

  • स्वप्न में स्वामी जी के दर्शन: प्राचीन समय में कुष्ठ रोग से पीड़ित एक अत्यंत धनी व्यापारी इस क्षेत्र में पहुंचे और एक अंजीर के वृक्ष की छांव में विश्राम करने लगे। रात्रि में भगवान रघुनाथ स्वामी ने उनके स्वप्न में प्रकट होकर संकेत दिया कि निकट स्थित जलकुंड में स्नान करने से उनका कष्ट दूर हो जाएगा।

  • रोगमुक्त हुआ व्यापारी: पूर्ण श्रद्धा के साथ स्नान करने के उपरांत वह व्यापारी तत्काल कुष्ठ रोग से पूरी तरह मुक्त हो गया।

  • भव्य पुष्करिणी का उपहार: इस ईश्वरीय कृपा और कृतज्ञता के स्वरूप उन्होंने इस विशाल, सीढ़ीदार और कलात्मक पुष्करिणी का निर्माण कराया। यह मंदिर सदाशिवपेट नगर की स्थापना से भी प्राचीन माना जाता है।

🎉 400वीं वर्षगांठ पर भव्य धार्मिक अनुष्ठान: 41 दिनों तक सजता है पारंपरिक मेला

वार्षिक उत्सव और सांस्कृतिक आयोजन:

  • वार्षिकोत्सव का आयोजन: हाल ही में इस ऐतिहासिक पुष्करिणी के निर्माण की 400वीं वर्षगांठ अत्यंत धूमधाम और उल्लास के साथ संपन्न हुई।

  • धार्मिक अनुष्ठान: पूज्य श्री बाल मार्तण्ड सर्वे मुखियाजी महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित कार्यक्रमों का शुभारंभ पुष्करिणी में प्रातःकालीन पवित्र स्नान से हुआ, जिसके उपरांत महाभिषेकम, रुद्राभिषेकम और विशाल भंडारे (अन्नप्रसादम) का आयोजन किया गया।

  • 41 दिवसीय मेला: इस तीर्थ स्थल पर हर वर्ष कार्तिक मास में विशेष उत्सव, श्रावण मास में रुद्राभिषेकम तथा 41 दिनों का पारंपरिक मेला लगता है, जिसमें हैदराबाद और अन्य नगरों के कलाकार सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देते हैं। स्थानीय नागरिकों ने इस अमूल्य धरोहर के स्थायी संरक्षण की मांग की है।

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