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मध्य प्रदेश में चीतों ने इंसानों के बीच जमाया डेरा, कूनो नेशनल पार्क टीम के सामने नई मुश्किल

 ग्वालियर। कूनो नेशनल पार्क के खुले जंगल में छोड़े गए मादा चीता ज्वाला और उसके चार शावकों ने जंगल छोड़ रिहायशी(आबादी) क्षेत्र में डेरा जमाया है। इससे चीता प्रबंधन में नई चुनौतियां सामने हैं। अगर चीते यहां से और आगे बढ़े तो वह राजस्थान की सीमा में प्रवेश कर जाएंगे।

इस बात को लेकर पार्क प्रशासन चिंतित है। रिहायशी क्षेत्र में चीतों की मौजूदगी से मानव द्वंद्व का भी खतरा है। चीतों के प्रति ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए जिन चीता मित्रों को तैयार किया गया था, वह भी सक्रिय नहीं हैं।

बीते शनिवार से ही चीते आबादी वाले क्षेत्र वीरपुर में डेरा जमाए हुए हैं। अब चीते तेलीपुरा गांव के पास पहुंच गए हैं। सोमवार रात को उनकी लोकेशन इसी गांव की मिली है। ग्रामीणों के चीतों से आमने-सामने होने का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है।

कूनो की ट्रैकिंग टीम व सामान्य वन मंडल का अमला चीतों की निगरानी कर रहा है। खुले जंगल में छोड़ी गई मादा चीता ज्वाला और उसके चार शावक शनिवार शाम को पहली बार पार्क की सीमा से बाहर आए थे। ये चीते रविवार को दोपहर बाद फिर कूनो के जंगल की ओर लौट गए थे।रविवार रात को चीते वीरपुर तहसील के भैरोंपुरा गांव के आसपास देखे गए। सोमवार सुबह मादा चीता ज्वाला के सामने बछड़ा आ गया तो उसने शिकार की नीयत से हमला कर दिया, लेकिन ग्रामीणों के पत्थर मारने से चीते पीछे हट गए।

लाठी डंडा लेकर चिल्लाते हुए ग्रामीणों को देख चीते डर गए। मादा चीता काफी देर तक बछड़े का गला पकड़े रही लेकिन फिर छोड़ दिया। वर्तमान में कूनो नेशनल पार्क में 17 चीते हैं।

महत्वपूर्ण है चीता मित्रों की भूमिका

कूनो नेशनल पार्क में 120 चीता मित्रों को प्रशिक्षण देकर तैयार किया गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन चीता मित्रों के साथ संवाद किया था। चीता मित्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। खासकर ऐसे ही समय में जब चीते पार्क की सीमा लांघते हैं। चीता मित्रों की अहम जिम्मेदारी ग्रामीणों को जागरूक कर मानव-चीता द्वंद्व रोकने की है। लंबे समय तक चीतों के बाड़े में होने से चीता मित्रों की सुधि ही नहीं ली गई।

चार दिनों में नहीं किया शिकार

ज्वाला और उसके शावकों ने पिछले चार दिनों में किसी भी जानवर का शिकार नहीं किया है। ग्रामीणों के पथराव की वजह से बछड़े का शिकार भी नहीं कर पाए। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहे हैं कि चीतों के लिए जंगल में पर्याप्त भोजन की कमी तो नहीं, जिससे वह जंगल की सरहद लांघ रहे हैं। या फिर लंबे समय तक बाड़े में रहने से उनके शिकार करने की क्षमता प्रभावित हो गई हो।

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