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बीवी को पढ़ाई करने से रोका तो खैर नहीं, MP हाईकोर्ट ने 10 साल पुराने तलाक के मामले पर सुनाया फैसला

मध्य प्रदेश के इंदौर में पति-पत्नी के संबंधों में क्रूरता किसे माना जाएगा, इसके मापदंडों को हाईकोर्ट ने तय करने की कोशिश की है. जस्टिस विवेक रुसिया और जस्टिस गजेंद्र सिंह की कोर्ट ने तलाक के मामले में फैसला सुनाते हुए पत्नी को पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर करने को मानसिक क्रूरता की श्रेणी में रखा है.

साथ ही इसे तलाक का आधार मानते हुए तलाक को मंजूरी दे दी. कोर्ट ने कहा- पत्नी को पढ़ाऊ छोड़ने को मजबूर करना या ऐसा माहौल बनाना कि वो पढ़ाई जारी न रख सके, वैवाहिक जीवन की शुरुआत में ही उसके सपनों को नष्ट करने के बराबर है. उसे ऐसे व्यक्ति के साथ रहने को मजबूर करना, जो न तो शिक्षित हैं और न ही खुद को बेहतर बनाने के लिए उत्सुक है, निश्चित रूप से मानसिक क्रूरता है और तलाक का आधार है. वहीं, एक दिन पहले भी तलाक के एक मामले में इंदौर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पलट दिया था.

शाजापुर जिले में रहने वाली भूरी का 1 मई 2015 को भीम नामक शख्स से विवाह हुआ था. तब वह 12वीं पास थी और आगे की पढ़ाई करना चाहती थी. ससुराल वालों ने उस समय सहमति दे दी थी. 1 साल बाद 16 जुलाई को गौना हुआ, तब कहा गया कि दो दिन में उसे वापस मायके भेज दिया जाएगा. ससुराल पहुंचने के बाद ससुरालियों ने उसे पढ़ने से रोक दिया. उसे वापस भेजने के बजाय दहेज में एक लाख रुपये कम देने और मोटरसाइिकल न देने को लेकर वो लोग उसे प्रताड़ित करने लगे. पुलिस हस्तक्षेप से भूरी के पिता उसे 27 जुलाई को घर ले आए. उसने शाजापुर कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की. पति ने विवाह बहाली के लिए याचिका लगाई. कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया ये कहकर कि ये साबित नहीं हुआ है कि पति ने पत्नी के साथ क्रूरता की.

तलाक को ऐसे मिली मंजूरी

ये भी साबित नहीं हुआ कि पति ने पत्नी के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाए. पत्नी खुद उसके साथ नहीं रहना चाहती और झूठे आधार पर केस लगाया है. इसके खिलाफ भूरी ने हाईकोर्ट में अपील की, जिसमें ये बात निकलकर सामने आई कि मायके आने के बाद भूरी ने स्नातक की पढ़ाई की. हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों को देखने और पत्नी को शिक्षा से रोकने के लिए पति के निचली अदालत में दिए बयान को ही आधार बनाकर तलाक को मंजूरी दे दी.

मानसिक क्रूरता साबित करना मुश्किल

कोर्ट ने मानसिक क्रूरता साबित करने को लेकर उठने वाले सवालों पर कहा- शारीरिक क्रूरता को आसानी से सिद्ध किया जा सकता है. लेकिन मानसिक क्रूरता को सबूतों के आधार पर सिद्ध करना मुश्किल है.

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